भैंस आधारित अर्थव्यवस्था ग्रामीण भारत की रीढ़, जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौती: डॉ केएम पाठक
आईसीएआर–आईवीआरआई में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. केएम पाठक ने भैंस आधारित अर्थव्यवस्था और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों पर डाला प्रकाश
आईवीआरआई में राष्ट्रीय कार्यशाला के दौरान मौजूद वैज्ञानिक।
बरेली,वाईबीएन नेटवर्क। इंडियन सोसायटी फॉर बफैलो डेवलपमेंट (ISBD) द्वारा आईसीएआर–भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई), इज्जतनगर में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान डॉ. केएम पाठक पूर्व महानिदेशक (पशु विज्ञान), आईसीएआर एवं पूर्व कुलपति उत्तर प्रदेश पंडित दीन दयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गौ अनुसंधान( दुवासू) मथुरा ने कहा कि भैंस आधारित पशुधन अर्थव्यवस्था आज ग्रामीण भारत की मुख्य चालक शक्ति बन चुकी है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है और भैंस इस चुनौती के प्रति अत्यंत संवेदनशील पशु है, इसलिए अनुसंधान, नीति और प्रसार सेवाओं में समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। डॉ पाठक ने कहा कि पशुधन क्षेत्र अब सहायक नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ बन चुका है और सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान लगातार बढ़ रहा है। भैंस न केवल पोषण और नियमित आय का साधन है, बल्कि रोजगार सृजन में भी इसकी बड़ी भूमिका है। अपने संबोधन में डॉ. पाठक ने कहा कि देश में भैंस दूध का योगदान कुल दुग्ध उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक है और भारत विश्व में लगातार कई वर्षों से दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भैंस का दूध भी A2 श्रेणी का होता है, जिसे लेकर पहले कई भ्रांतियाँ थीं। आज “ब्लैक गोल्ड” कही जाने वाली भैंस छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका का प्रमुख आधार है।
डॉ. पाठक ने भैंस उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऊष्मा तनाव, प्रजनन समस्याएं और स्वास्थ्य प्रबंधन आज प्रमुख मुद्दे हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को लेकर पहले संदेह था, लेकिन अब यह वास्तविकता बन चुका है और वैज्ञानिकों ने इसे प्रमाणित कर दिया है। ऐसे में जलवायु-सहिष्णु भैंस उत्पादन मॉडल विकसित करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि हरियाणा और पंजाब जैसे प्रजनन क्षेत्रों में भैंसों की संख्या घट रही है, जो शुभ संकेत नहीं है।
इसके लिए नीति निर्माताओं को जागरूक करने, प्रसार सेवाओं को सशक्त बनाने और वैज्ञानिकों के बीच अधिक परस्पर सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने आईएसबीडी द्वारा नियमित अंतराल पर वार्षिक सम्मेलन आयोजित करने की परंपरा की सराहना करते हुए कहा कि आज के समय में कई संगठन ऐसा नहीं कर पा रहे हैं, जबकि आईएसबीडी इस दिशा में निरंतर सक्रिय है। उन्होंने 2018 में आयोजित 9वें एशियन बफैलो कांग्रेस तथा अन्य राष्ट्रीय आयोजनों में संस्था की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया।
डॉ. पाठक ने आंध्र प्रदेश के प्रगतिशील भैंस पालक श्री राजीव को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की। डॉ पाठक ने कहा कि आईवीआरआई न केवल एक विरासत संस्थान है, बल्कि पशु चिकित्सा विज्ञान का “मक्का–मदीना” है, जहाँ से देश की पशु विज्ञान अनुसंधान परंपरा को दिशा मिली है।
डॉ. पाठक ने आईवीआरआई की स्थापना से लेकर अब तक की उपलब्धियों को अतुलनीय बताते हुए कहा कि इस महान संस्थान और इसके विभिन्न परिसरों के योगदान को शब्दों में समेटना संभव नहीं है। इसके लिए संस्थान के पूर्व निदेशकों, कुलपतियों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों और कर्मचारियों की सामूहिक साधना प्रशंसनीय है। डॉ. पाठक ने निदेशक प्रो. (डॉ.) त्रिवेणी दत्त के नेतृत्व में आईवीआरआई द्वारा शैक्षणिक कार्यक्रमों, अधोसंरचना विकास, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, अनुसंधान एवं विस्तार गतिविधियों में हो रहे उल्लेखनीय विस्तार की सराहना की।
उन्होंने आईवीआरआई को एनएएसी द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च ‘A++’ ग्रेड को संस्थान, संकाय, विद्यार्थियों एवं समग्र शिक्षा प्रणाली की बड़ी उपलब्धि बताया। इस अवसर पर आईवीआरआई, इज्जतनगर के निदेशक एवं कुलपति प्रो. (डॉ.) त्रिवेणी दत्त ने अपने संबोधन में कहा कि संस्थान ने पशु विज्ञान के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान दिया है, जिसमें देश से चार प्रमुख पशु रोगों तथा वैश्विक स्तर पर एक रोग के उन्मूलन में भूमिका शामिल है।
उन्होंने बताया कि आईवीआरआई प्रधानमंत्री राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम को तकनीकी सहयोग, टीकों की आपूर्ति, जैविक उत्पादों की गुणवत्ता जांच तथा क्षमता निर्माण के माध्यम से महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान कर रहा है। उन्होंने कहा कि आईवीआरआई देश में जैविक उत्पादों की गुणवत्ता नियंत्रण जांच की राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभा रहा है तथा 12 महत्वपूर्ण जैविक उत्पादों की नियमित आपूर्ति कर रहा है, जिनमें मानव रोगों से संबंधित दो जैविक भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, रोग प्रकोप की स्थिति में त्वरित निदान और राज्यों को राष्ट्रीय परामर्श देना भी संस्थान की प्रमुख जिम्मेदारियों में है।
वन्यजीव स्वास्थ्य के क्षेत्र में आईवीआरआई को केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय संदर्भ केंद्र के रूप में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने भैंस को भारत की दुग्ध अर्थव्यवस्था की “ब्लैक गोल्ड” बताते हुए कहा कि देश के कुल दुग्ध उत्पादन में भैंस का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक है और भविष्य में भी यह पशु ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बना रहेगा। उन्होंने वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और किसानों से आह्वान किया कि भैंस के संरक्षण, कल्याण और सतत विकास के लिए आधुनिक तकनीकों और नवाचारों को अपनाया जाए। शैक्षणिक उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए प्रो. दत्त ने बताया कि आईवीआरआई 1983 से डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूप में कार्यरत है और समय के साथ यूजी, पीजी, पीएचडी, बीटेक, एमबीए, बायोइन्फॉर्मेटिक्स सहित अनेक नए पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप 80 से अधिक डिप्लोमा, प्रमाणपत्र और व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्रारंभ कर व्यावसायिक शिक्षा को सुदृढ़ किया गया है। ओपन एवं डिस्टेंस लर्निंग तथा ऑनलाइन कार्यक्रमों के माध्यम से भी संस्थान अपनी पहुंच का प्रसार कर रहा है। प्रो. दत्त ने बताया कि हाल ही में आईवीआरआई को उच्च शिक्षा परिषद द्वारा NAAC A++ श्रेणी प्राप्त हुई है, जिससे संस्थान को नए पाठ्यक्रम शुरू करने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने और विभिन्न परिसरों में विस्तार के नए अवसर मिले हैं।
वन्यजीव स्वास्थ्य के क्षेत्र में नए विभाग और मास्टर डिग्री कार्यक्रम की योजना भी अंतिम चरण में है। सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए आयोजन सचिव डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह की सराहना करते हुए प्रो. दत्त ने कहा कि सीमित समय, यात्रा संबंधी कठिनाइयों और अन्य चुनौतियों के बावजूद उन्होंने इस राष्ट्रीय सम्मेलन को उत्कृष्ट रूप से संपन्न कराया। अपने वक्तव्य के अंत में प्रो. त्रिवेणी दत्त ने सम्मेलन में पधारे सभी अतिथियों, वैज्ञानिकों, किसानों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए आईएसबीडी को इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयोजन के लिए धन्यवाद दिया।
इंडियन सोसायटी फॉर बफैलो डेवलपमेंट के अध्यक्ष एवं बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पटना के कुलपति डॉ. इंद्रजीत सिंह ने भैंस विकास के सतत् उन्नयन हेतु वैज्ञानिक प्रगति तथा उसके क्षेत्र स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन को गति देने के लिए शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, उद्योग और किसानों के बीच सुदृढ़ सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। सम्मेलन के आयोजन सचिव डॉ. ज्ञानेंद्र सिंह ने उपस्थितजनों को सम्मेलन के उद्देश्यों से अवगत कराया तथा बताया कि यह आयोजन भैंसों में जलवायु-संवेदनशील प्रजनन, स्वास्थ्य प्रबंधन, पोषण एवं प्रिसीजन उत्पादन प्रौद्योगिकियों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श के लिए एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन में देश के विभिन्न प्रदेशों से 150 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। उन्होंने इस सम्मेलन में भाग लेने हेतु देश की विभिन्न कंपनियों के प्रति भी आभार प्रकट किया। कार्यक्रम का संचालन संयुक्त रूप से डॉ अंशुक शर्मा तथा डॉ मीमांशा शर्मा द्वारा किया गया जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ हरी अब्दुल समद द्वारा दिया गया। इस अवसर पर संस्थान के सभी संयुक्त निदेशकों सहित पूर्व निदेशकों, वैज्ञानिक तथा अधिकारी उपस्थित रहे।




