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मोदी की यूरोप से दोस्ती, तुर्किए की बढ़ी टेंशन! 'कस्टम यूनियन' समझौते पर खतरा

भारत-EU ट्रेड डील से तुर्किए के लिए एक बड़ा ट्रेड असंतुलन पैदा होने का खतरा है, क्योंकि EU के साथ उसका पहले से ही एक कस्टम यूनियन समझौता है, जिस पर अब खतरा मंडराता नजर आ रहा है।

मोदी की यूरोप से दोस्ती, तुर्किए की बढ़ी टेंशन! कस्टम यूनियन समझौते पर खतरा
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अंकारा, वाईबीएन डेस्क। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूरोप से दोस्ती और इंडिया-EU ट्रेड समझौते से यूरोपीय देश का प्रमुख सहयोगी तुर्किए नाखुश है। तुर्किए के मीडिया में इस डील को लेकर बवाल मचा हुआ है। माना जा रहा है कि भारत-EU ट्रेड डील से तुर्किए के लिए एक बड़ा ट्रेड असंतुलन पैदा होने का खतरा है, क्योंकि EU के साथ उसका पहले से ही एक कस्टम यूनियन समझौता है। जानकारों का मानना है कि इस समझौते से 2032 तक EU से भारत को होने वाले एक्सपोर्ट दोगुना होने की उम्मीद है, और इसमें भारत द्वारा EU को टैरिफ में ऐसी छूट दी गई है जो किसी अन्य ट्रेडिंग पार्टनर को नहीं दी गई है। इतना ही नहीं, EU द्वारा भारतीय प्रोडक्ट्स पर लगाया जाने वाला औसत टैरिफ रेट 3.8% से घटाकर 0.1% कर दिया जाएगा।

आपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की मदद की थी

तुर्की, जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का समर्थन किया था और जिससे भारत के साथ उसके संबंध खराब हो गए थे, वह इस ट्रेड डील की कड़ी आलोचना कर रहा है। तुर्किए का मीडिया इसे ऐसा बता रहा है, जिसके "तुर्की के लिए गंभीर परिणाम होंगे। हालांकि भारत से तुर्किए का ट्रेड काफी कम है। लेकिन नई डील से उसके यूरोपीय देशों से होने वाले ट्रेड पर इसका असर जरूर होगा।

ईयू व्यापार कानूनों में तुर्किए से सलाह नहीं करता

तुर्किए मीडिया मिलियेट में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, "कस्टम्स यूनियन समझौता न केवल कस्टम्स में असमानता के मामले में बल्कि फैसले लेने के तरीकों में भी तुर्किए के खिलाफ काम करता है। EU अपने व्यापार कानूनों को अपडेट करते समय तुर्किए से सलाह नहीं लेता है। हालांकि, तुर्किए को कस्टम्स यूनियन के अनुसार नए नियमों को लागू करने के लिए मजबूर किया जाता है। तुर्की के सामान ले जाने वाले ट्रकों पर कोटा लागू होता है, और व्यापारियों को वीज़ा प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ाती है और तुर्किए उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कम करती है।"

क्या है EU कस्टम्स यूनियन समझौता

EU कस्टम्स यूनियन समझौता जिस पर तुर्किए ने 1996 में यूरोपियन यूनियन के साथ साइन किया था। इस समझौते के अनुसार, जब EU किसी तीसरे देश के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) साइन करता है, तो उस देश का सामान EU के रास्ते तुर्किए के बाज़ार में बिना ड्यूटी के आ सकता है। हालांकि, उसी देश को सामान बेचते समय तुर्किए को कस्टम ड्यूटी देनी पड़ती है। इस मामले में, जबकि भारतीय सामान किसी भी दूसरे यूरोपीय देश के रास्ते तुर्की में बिना ड्यूटी के आ सकता है, तुर्की का सामान टैरिफ छूट का फायदा नहीं उठा सकता। तुर्किए का सामान FTA शर्तों के तहत भारत में प्रवेश नहीं कर सकता, बेशक ही उसे किसी दूसरे देश से भेजा गया हो।

तुर्किए के विदेशी व्यापार को जटिल बनाएगी डील

तुर्किए मीडिया के अनुसार, यह डील तुर्किए के विदेशी व्यापार और उसके औद्योगिक उत्पादन को और जटिल बना सकती है। औद्योगिक उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी खत्म होने से, भारतीय सामान अपने सस्ते श्रम और बड़ी उत्पादन क्षमता के कारण - तुर्कि के बाज़ार के फायदे को खत्म कर सकता है। अंकारा को डर है कि टेक्सटाइल, स्टील और ऑटोमोटिव सब-इंडस्ट्री में तुर्किए का कुछ मार्केट शेयर भारत में शिफ्ट हो सकता है।

भारत का सामान आसानी से तुर्किए के बाजार में पहुंचेगा

हालांकि भारत सहित तीसरे देशों के साथ FTA साइन करने की तुर्किए की कोशिशें इस समय संभव नहीं हैं, लेकिन भारतीय सामान EU के ज़रिए आसानी से तुर्की के बाज़ार में पहुंच सकता है। इस डील से खतरा महसूस करते हुए, तुर्कि मीडिया अब कस्टम्स यूनियन समझौते को अपडेट करने की मांग कर रहा है, ताकि यह EU सप्लाई चेन में तुर्की की स्थिति को और भी कमज़ोर न बना दे। बिज़नेस कम्युनिटी का हवाला देते हुए, वे तर्क देते हैं कि FTA तुर्किए पर नकारात्मक असर डालेंगे और कस्टम्स यूनियन का आधुनिकीकरण तुरंत ज़रूरी है।


Mukesh Pandit

Mukesh Pandit

पत्रकारिता की शुरुआत वर्ष 1989 में अमर उजाला से रिपोर्टिंग से करने वाले मुकेश पंडित का जनसरोकार और वास्तविकत पत्रकारिता का सफर सतत जारी है। उन्होंने अमर उजाला, विश्व मानव, हरिभूमि, एनबीटी एवं दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में फील्ड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक अपनी सेवाएं दीं हैं। समाचार लेखन, विश्लेषण और ग्राउंड रिपोर्टिंग में निपुणता के साथ-साथ उन्होंने समय के साथ डिजिटल और सोशल मीडिया को भी बख़ूबी अपनाया है। करीब 35 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ मुकेश पंडित आज भी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनहित, राष्ट्रहित और समाज की सच्ची आवाज़ बनने के मिशन पर अग्रसर हैं।

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