भारत को 'महा-गिफ्ट': क्या रूसी तेल से हटेगा 25% टैरिफ?
क्या ट्रंप प्रशासन भारत पर लगे 25% रूसी तेल टैरिफ को हटाने के संकेत दे रहा है। क्या पीएम मोदी की दोस्ती और 'इंडिया फर्स्ट' नीति ने अमेरिका को झुकाया?

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । वाशिंगटन से लेकर नई दिल्ली तक हलचल तेज है। अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट के एक ताजा बयान ने ग्लोबल मार्केट में सनसनी फैला दी है। संकेत मिले हैं कि ट्रंप प्रशासन भारत पर लगे 25% रूसी तेल टैरिफ को हटा सकता है, जिससे भारत को सीधे 5 बिलियन डॉलर का बंपर फायदा होने की उम्मीद है।
अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के साथ ही भारत-यूएस संबंधों में एक नई और दिलचस्प पटकथा लिखी जा रही है। अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में दावोस में जो कहा, उसने अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को चौंका दिया है। बेसेंट ने स्पष्ट किया कि भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर लगाया गया 25% टैरिफ अब हटाने का रास्ता खुल गया है।
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह टैरिफ एक "सफलता" रहा है। उनके दावों के मुताबिक, टैरिफ लगने के बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी, जिससे अमेरिका का उद्देश्य पूरा हुआ। लेकिन अब, जब यूरोप और अमेरिका के बीच व्यापारिक समीकरण बदल रहे हैं, वाशिंगटन भारत को अपनी ओर खींचने के लिए इस 'हथियार' को वापस लेने की तैयारी में है।
50,000 करोड़ रुपए का फायदा: भारत की झोली में गिरेगा 'महा-गिफ्ट'
अगर यह टैरिफ हटता है, तो यह भारत के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं होगा। आंकड़ों की मानें तो टैरिफ हटने से भारत को करीब 5 बिलियन डॉलर (लगभग 50,000 करोड़ रुपए) से ज्यादा की बचत हो सकती है।
सस्ता कच्चा तेल: रिफाइनरियों को फिर से रियायती दरों पर रूसी तेल मिल सकेगा।
पेट्रोल-डीजल की कीमतें: घरेलू बाजार में तेल की कीमतों पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी।
ट्रेड बैलेंस: अमेरिका के साथ होने वाले व्यापार घाटे में सुधार की संभावना।
लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका यह सब बिना किसी शर्त के कर रहा है? या इसके पीछे यूरोप के साथ चल रहा ट्रेड वॉर है?
दावोस की इनसाइड स्टोरी: पीएम मोदी और ट्रंप की केमिस्ट्री
दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना "करीबी दोस्त" और "शानदार इंसान" बताया। ट्रंप का यह बयान तब आया है जब वह खुद भारत पर कड़े टैरिफ लगाने की धमकी दे चुके थे।
अगस्त 2025 में ट्रंप ने भारत के आयात पर शुल्क बढ़ाकर 50% तक कर दिया था, जिसमें 25% विशेष रूप से रूस के साथ ऊर्जा संबंधों के कारण था। ट्रंप ने खुले तौर पर कहा था, "मोदी जानते थे कि मैं खुश नहीं हूं, और मुझे खुश करना उनके लिए जरूरी था।" यह अमेरिका की 'प्रेशर पॉलिटिक्स' का हिस्सा था, लेकिन अब ट्रंप की टोन बदलती दिख रही है।
'इंडिया फर्स्ट' नीति: दबाव के आगे नहीं झुकी नई दिल्ली
अमेरिकी कांग्रेस में एक ऐसा बिल भी पाइपलाइन में है जो रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक का भारी शुल्क लगाने की वकालत करता है। इसके बावजूद, भारत अपनी "इंडिया फर्स्ट" ऊर्जा नीति पर अडिग है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ किया है कि भारत की प्राथमिकता अपने 1.4 अरब नागरिकों के लिए "किफायती ऊर्जा" सुनिश्चित करना है। भारत ने कभी भी रूसी तेल आयात पूरी तरह बंद करने का लिखित आश्वासन नहीं दिया, बल्कि इसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का हिस्सा माना।
रिफाइनरियों का बदला गणित: रिलायंस और IOC की नई रणनीति
ट्रंप प्रशासन के दबाव और पश्चिमी प्रतिबंधों का असर जमीन पर दिखने लगा है। केप्लर के आंकड़ों के अनुसार:
दिसंबर में रूसी यूराल्स कच्चे तेल का आयात घटकर 929,000 बैरल प्रति दिन रह गया।
यह दिसंबर 2022 के बाद का सबसे निचला स्तर है।
रिलायंस इंडस्ट्रीज, जो पहले सबसे बड़ी खरीदार थी, उसने जनवरी में रूसी तेल का आयात रोक दिया है।
अब भारतीय कंपनियां मिडिल ईस्ट, वेस्ट अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे वैकल्पिक लेकिन महंगे विकल्पों की ओर रुख कर रही हैं। ऐसे में अगर अमेरिका 25% टैरिफ हटाता है, तो इन रिफाइनरियों को एक बड़ी राहत मिलेगी।
क्या यह भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है?
अमेरिका का यह संकेत भारत के लिए राहत भरा है, लेकिन यह ग्लोबल ट्रेड की एक चाल भी हो सकती है। ट्रंप प्रशासन भारत को चीन और रूस के प्रभाव से दूर रखना चाहता है। वहीं, भारत के लिए यह मौका है कि वह अपनी शर्तों पर व्यापार समझौता (Trade Deal) फाइनल करे।


