बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर पर अपनी-अपनी दलीलें पेश, फैसला सुरक्षित रखा
चुनौती दी गई थी निर्वाचन आयोग के पास लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 और इसके तहत बनाए गए नियमों के तहत इतने बड़े पैमाने पर एसआईआर को लागू करने की शक्तियां नहीं हैं।

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं में गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से दायर याचिका भी शामिल है। इन याचिकाओं में दावा किया गया है कि निर्वाचन आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद-326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 और इसके तहत बनाए गए नियमों के तहत इतने बड़े पैमाने पर एसआईआर को लागू करने की शक्तियां नहीं हैं।
असम में मतदाता सूचियों का एक अलग 'विशेष पुनरीक्षण
शीर्ष अदालत इन याचिकाओं में किए गए दावों की जांच कर रहा है। बिहार में एसआईआर प्रक्रिया का संचालन पहले चरण में किया गया था। मतदाता सूची के एसआईआर की प्रक्रिया का दूसरा चरण छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित नौ राज्यों के अलावा अंडमान एवं निकोबार, लक्षद्वीप और पुडुचेरी सहित देश के तीन केंद्रशासित प्रदेशों में चलाई जा रही है। असम में मतदाता सूचियों का एक अलग 'विशेष पुनरीक्षण' चल रहा है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल, अभिषेक सिंघवी, प्रशांत भूषण और गोपाल शंकरनारायण सहित कई वकीलों की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई पूरी की।
आयोग के वकीलों की सुनी गई दलीलें
इस मामले में निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह उपस्थित हुए। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रतिवाद प्रस्तुत करने वाली दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने पिछले साल 12 अगस्त को इस मामले में अंतिम बहस शुरू की थी, जिसमें उसने कहा था कि मतदाता सूची में नामों को शामिल करना या हटाना भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है। निर्वाचन आयोग ने बिहार में उन 65 लाख लोगों के नाम जारी किए हैं जिन्हें एसआईआर प्रक्रिया के तहत प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची से हटा दिया गया।
मतदाता पहचान पत्र नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं
निर्वाचन आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि आधार और मतदाता पहचान पत्रों को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में नहीं माना जा सकता है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक 'एनआरसी जैसी प्रक्रिया' थी, जिसमें निर्वाचन आयोग नागरिकता का सत्यापन कर रहा है, जबकि यह शक्ति केंद्र सरकार के पास निहित है। एक प्रमाण के रूप में आधार कार्ड की स्वीकार्यता के संबंध में, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जालसाजी की संभावना 12 अंकों के बायोमेट्रिक पहचानकर्ता को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकती है।
पांच करोड़ लोगों को अनुमानित रूप से बाहर करने का आरोप
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सिंघवी ने निर्वाचन आयोग पर एसआईआर में पांच करोड़ लोगों को अनुमानित रूप से बाहर करने का आरोप लगाया। एडीआर की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस प्रक्रिया को पूरा करने की समयसीमा पर सवाल उठाया। राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि बिहार में मतदाताओं की कुल वयस्क आबादी 7.9 करोड़ के बजाय 8.18 करोड़ थी और एसआईआर प्रक्रिया का उद्देश्य वास्तव में मतदाताओं को सूची से हटाना था।


