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आखिर कितना और गिरेगा रुपया? विदेशी निवेश की सुस्ती से बढ़ी चिंता

वैश्विक अनिश्चितता, कमजोर विदेशी पूंजी प्रवाह और चालू खाता घाटे के दबाव में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया नए लाइफटाइम लो स्तर के करीब, महंगाई बढ़ने की आशंका

आखिर कितना और गिरेगा रुपया? विदेशी निवेश की सुस्ती से बढ़ी चिंता
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नई दिल्‍ली, वाईबीएन डेस्‍क: भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरते हुए नए लाइफटाइम लो स्तर के करीब पहुंच गया है। डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर तक फिसलता दिखा है। यह गिरावट ऐसे समय में सामने आई है, जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है और उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी का प्रवाह कमजोर पड़ रहा है। साल 2026 के जनवरी महीने में ही अब तक रुपया करीब 2.3 फीसदी टूट चुका है, जो सितंबर 2022 के बाद इसकी सबसे खराब मासिक प्रदर्शन मानी जा रही है।

करेंसी का कमजोर होना कई तरह की आर्थिक चुनौतियां लेकर आता है

बीते लंबे समय से भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होती जा रही है। शुक्रवार को रुपया 91.9125 के स्तर पर खुला, जो पिछले कारोबारी सत्र के बंद भाव 91.9550 के आसपास ही रहा। इससे पहले के सत्र में रुपया गिरकर 91.9850 के लाइफटाइम लो स्तर तक पहुंच गया था। मौजूदा महीने में आई यह गिरावट निवेशकों की चिंता बढ़ाने वाली है, क्योंकि किसी भी देश के लिए करेंसी का कमजोर होना कई तरह की आर्थिक चुनौतियां लेकर आता है। रुपये में जारी कमजोरी के पीछे कई बड़े वैश्विक कारण माने जा रहे हैं। टैरिफ, ट्रेड वॉर और भू-राजनीतिक तनावों के चलते वैश्विक अनिश्चितता चरम पर है। इसके असर से उभरते बाजारों में विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी हुई है। वहीं विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिल रहा है, जिससे वे जोखिम वाले बाजारों में निवेश को लेकर सतर्क रुख अपना रहे हैं।

मौजूदा करेंसी कमजोरी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है

इसके अलावा भारत का चालू खाता घाटा भी रुपये पर दबाव बढ़ाने वाला एक अहम कारण है। आयात और निर्यात के अंतर को पाटने के लिए देश को विदेशी पूंजी पर निर्भर रहना पड़ता है। जब विदेशी निवेश कमजोर होता है, तो मुद्रा पर दबाव बढ़ता है और रुपये में गिरावट देखने को मिलती है। गुरुवार को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2026 के बाद आयोजित प्रेस ब्रीफिंग में मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वेंकटरामनन अनंत नागेश्वरन ने भी रुपये की गिरावट को व्यापक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा करेंसी कमजोरी सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। जिन देशों का चालू खाता घाटा है, उनकी मुद्राओं में भी अवमूल्यन देखने को मिला है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लंबी अवधि में भारतीय रुपये का प्रदर्शन अपेक्षाकृत स्थिर और संतोषजनक रहा है।

करेंसी की स्थिरता और मजबूती के लिए मजबूत विनिर्माण क्षमता जरूरी

सीईए ने कहा कि सहस्राब्दी की शुरुआत से अब तक अगर विभिन्न देशों की मुद्राओं के प्रदर्शन की तुलना की जाए, तो भारतीय रुपया बेहतर स्थिति में नजर आता है। उन्होंने समझाया कि जब वैश्विक कारणों से विदेशी पूंजी प्रवाह कमजोर होता है, तो पूंजी आयात करने वाले देशों की मुद्राएं स्वाभाविक रूप से दबाव में आ जाती हैं। नागेश्वरन ने यह भी साफ किया कि केवल बाजार में हस्तक्षेप के जरिए मुद्रा को लंबे समय तक मजबूत नहीं बनाया जा सकता। उनके मुताबिक, करेंसी की स्थिरता और मजबूती के लिए मजबूत विनिर्माण क्षमता जरूरी है। विनिर्माण और निर्यात में तेज वृद्धि से चालू खाता स्थिति सुधरती है और विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा मिलता है, जिससे धीरे-धीरे मुद्रा में भरोसा बढ़ता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने स्विट्जरलैंड, जापान, कोरिया, ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों का उल्लेख किया, जहां मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के कारण मुद्राएं स्थिर बनी हुई हैं।

सीधा असर महंगाई पर पड़ने का खतरा रहता है

सीईए के अनुसार, रुपये का लाइफटाइम लो स्तर पर पहुंचना किसी तात्कालिक आर्थिक संकट का संकेत नहीं है, लेकिन यह वैश्विक पूंजी प्रवाह में आई कमजोरी और निवेशकों की सतर्कता को जरूर दर्शाता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रुपये में लगातार गिरावट का सीधा असर महंगाई पर पड़ने का खतरा रहता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में रुपये के कमजोर होने पर तेल आयात के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं। इसका असर परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत पर पड़ता है और महंगाई बढ़ने का जोखिम बढ़ जाता है। इसके अलावा विदेशों में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश पैसा भेजने वालों के लिए भी खर्च बढ़ जाता है, क्योंकि आयातित वस्तुएं और सेवाएं महंगी हो जाती हैं।


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