Top
Begin typing your search above and press return to search.

पंडित भीमसेन जोशी: बिना टिकट सफर से 'भारत रत्न' तक का जादुई सफर

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के शिखर पुरुष पंडित भीमसेन जोशी की आज पुण्यतिथि है। उनका संगीत सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है; गुरु की तलाश में उन्होंने महज 11 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और कई दिनों तक ट्रेनों में बिना टिकट सफर किया।

YBN Desk
पंडित भीमसेन जोशी: बिना टिकट सफर से भारत रत्न तक का जादुई सफर
X

मुंबई। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के शिखर पुरुष पंडित भीमसेन जोशी की आज पुण्यतिथि है। उनका संगीत सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है; गुरु की तलाश में उन्होंने महज 11 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और कई दिनों तक ट्रेनों में बिना टिकट सफर किया। किराना घराने के इस दिग्गज ने जब राग भैरव और 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' को अपनी आवाज दी, तो पूरी दुनिया मंत्रमुग्ध हो गई। सुरों के प्रति उनकी दीवानगी ऐसी थी कि उन्होंने अपनी गायकी से एक अमर विरासत रच दी, जिसके लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा गया। भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया के महानायक पंडित भीमसेन जोशी को ख्याल गायकी का बादशाह कहा जाता है। वह केवल शानदार सुरों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी जीवन गाथा और दिलचस्प किस्सों के लिए जाने जाते थे। 24 जनवरी को उनकी पुण्यतिथि है, ऐसे में उनके एक किस्से से आपको रूबरू कराते हैं।


संगीत में उनकी रुचि इतनी गहरी थी कि एक बार 11 साल की उम्र में जब वे ट्रेन में बिना टिकट सफर करते हुए पकड़े गए, तो उन्होंने राग भैरव गाकर टीटीई से अपना पीछा छुड़ाया। उस समय भले ही ट्रेन यात्रियों को उस बच्चे के संगीत के प्रति जुनून का अंदाजा न लगा हो, लेकिन वह बच्चा बिना टिकट ही एक महान गायक बनने के सफर पर निकल चुका था। भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गड़ग जिले में हुआ। उनके माता-पिता ने उनका नाम भीमसेन गुरुराज जोशी रखा, लेकिन बाद में वह पंडित भीमसेन जोशी के नाम से प्रसिद्ध हुए। बचपन में ही उनका संगीत के प्रति झुकाव दिखाई देने लगा। स्कूल से लौटते समय वह अक्सर रास्ते में ट्रांजिस्टर की दुकानों पर रुककर बजते रिकॉर्ड सुनते और उनसे सीखने की कोशिश करते। यह संगीत के प्रति उनका शुरुआती कदम था, जिसने आगे चलकर उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सबसे बड़ा नाम बना दिया।

भीमसेन की गुरु की तलाश में की गई यात्रा उनके साहस और संगीत के प्रति समर्पण का उदाहरण है। 1933 में सिर्फ 11 साल की उम्र में वे घर छोड़कर संगीत सीखने के लिए निकल पड़े। उनके पास पैसे नहीं थे, जिससे टिकट खरीदना संभव नहीं था। वे ट्रेन में बिना टिकट बैठ गए। जब टीटीई ने उनसे टिकट दिखाने को कहा, तो भीमसेन ने साफ-साफ कहा कि उनके पास पैसे नहीं हैं।

इस पर टीटीई जब उन पर जुर्माना लगाने को तैयार दिखा तो भीमसेन ने उन्हें राग भैरव सुना दिया, जिसे सुनकर टीटीई और कोच में मौजूद यात्री मंत्रमुग्ध हो गए। उनकी गायकी और आत्मविश्वास ने यात्रियों को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने टिकट और जुर्माने की भरपाई की और भीमसेन सम्मानपूर्वक बीजापुर पहुंच गए।

भीमसेन की संगीत यात्रा में उनके गुरु सवाई गंधर्व का बड़ा योगदान रहा। उन्होंने अपने गुरु के घर रहकर कई वर्षों तक तोड़ी, पूरिया, भैरव और यमन जैसी रागों की तालीम ली। उनके गायन में गुरु की सिखाई परंपरा और उनकी अपनी शैली का अनोखा मेल दिखाई देता है। 19 साल की उम्र में भीमसेन जोशी ने अपनी पहली मंचीय प्रस्तुति दी और अगले साल उनका पहला एल्बम रिलीज हुआ। इसके बाद वह रेडियो कलाकार के रूप में मुंबई में काम करने लगे।

पंडित भीमसेन जोशी का गायन केवल ख्याल तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने ठुमरी, तप्पा, भजन और नाट्य संगीत को भी अपनाया और अपने अंदाज में प्रस्तुत किया। उनके पसंदीदा रागों में यमन, शुद्ध कल्याण, मारुबिहाग, बिहाग, बसंत बहार, मियां मल्हार, अभोगी और दरबारी शामिल थे। उनके सुर और तानों में जो गहराई थी, उसने लाखों श्रोताओं के दिलों को छू लिया।

उनके योगदान को देश ने हमेशा याद रखा। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण सहित कई बड़े सम्मान मिल चुके थे। संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए उन्हें 2008 में भारत रत्न से भी नवाजा गया। इसकेअलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप और कर्नाटक रत्न जैसे अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए।पंडित भीमसेन जोशी ने अपनी कला से केवल भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का नाम रोशन किया। लंबी बीमारी के चलते उन्होंने 24 जनवरी 2011 को पुणे में अंतिम सांस ली। उनकी गायकी ने हर उम्र के श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया और उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच अमर बना दिया।


Related Stories
Next Story
All Rights Reserved. Copyright @2019
Powered By Hocalwire