अरे वाह ... मिट्टी की उंगलियों से सपनों की तस्वीर
गंगा एक्सप्रेसवे की सर्विस रोड पर खिली दो नन्हीं कलाकारों की अनकही कहानी

शाहजहांपुर वाईबीएन संवाददाताः जहां गंगा एक्सप्रेसवे पर कैमरे रील तलाशते हैं, वहीं उसी सड़क पर दो नन्हीं उंगलियां मिट्टी में भविष्य रच रही थीं। न कोई मंच, न दर्शक दीर्घा - बस पीली मिट्टी, खुली सड़क और दो मासूम बेटियां, जिनकी कला ने चलते क़दमों को ठिठका दिया।
सड़क बनी कैनवास, मिट्टी बनी रंग
जिगनेरा से अतिबरा की ओर जाने वाली गंगा एक्सप्रेसवे की सर्विस रोड पर यह दृश्य आम नहीं था। सड़क किनारे बैठी दो नन्हीं बालिकाएं पीली मिट्टी के ढेलों से कमल, गुलाब और कई आकृतियां गढ़ रही थीं। मिट्टी की सोंधी गंध में उनके सपने भी घुलते जा रहे थे। राहगीर रुके, कुछ देर देखा और फिर बिना बोले आगे बढ़ गए, शायद भीतर कुछ टूट-सा गया था।
गरीबी के बीच पलती प्रतिभा
इन बच्चियों के पिता एक सामान्य मजदूर हैं। रोज़ी-रोटी की जद्दोजहद के बीच उनकी बेटियां कला को सांस की तरह जी रही हैं। किसी आर्ट स्कूल का नाम नहीं जानतीं, लेकिन मिट्टी से संवाद करना जानती हैं। ये बेटियाँ पास के बेसिक स्कूल में पढ़ती हैं और मन ही मन कलाकार बनने का सपना देखती हैं।
रील से अलग, यह थी रियल लाइफ
गंगा एक्सप्रेसवे आज रील और शॉर्ट वीडियो का हॉटस्पॉट बन चुका है। लोग आते हैं, कैमरा ऑन करते हैं और चले जाते हैं। लेकिन इन बेटियों की कला कोई रील नहीं थी, यह रियल लाइफ की रचना थी। बिना लाइक, बिना शेयर, फिर भी असरदार। यही वजह है कि जिसने भी देखा, ठिठक गया।
सवाल व्यवस्था से
क्या ऐसी प्रतिभाएं केवल सड़क तक ही सीमित रह जाएंगी?
क्या शिक्षा विभाग, खासकर बीएसए स्तर पर कोई पहल नहीं होनी चाहिए?
क्या जिलाधिकारी जैसे संवेदनशील अधिकारी कोई ऐसी योजना नहीं बना सकते, जिससे गाँवों की गरीब लेकिन प्रतिभाशाली बेटियों को मंच, मार्गदर्शन और साधन मिल सकें?
कला भी है शिक्षा, संवेदना भी
इन बच्चियों की कला केवल सौंदर्य नहीं रचती, यह समाज से सवाल भी पूछती है। यह बताती है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती, लेकिन निखार के लिए अवसर ज़रूरी होता है। यदि समय रहते इन उँगलियों को सही दिशा मिल जाए, तो यही मिट्टी कल किसी राष्ट्रीय पहचान का आधार बन सकती है।


