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गंगा एक्सप्रेसवे में जमीन गई, मुआवजा नहीं, उपले बीन कट रही जिंदगी

गीता और प्रेमा से बातचीत में खुली गरीबी की परतें और खेतों से चूल्हे तक ‘विकसित भारत’ का असल तस्वीर

शाहजहांपुर, वाईबीएन संवाददाताः गंगा एक्सप्रेसवे के किनारे फैला एक बड़ा सा तालाब… वही मिट्टी, जिससे होकर विकास की रफ्तार दौड़ी। इसी जमीन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गंगा एक्सप्रेसवे का सपना साकार हुआ। लेकिन उसी एक्सप्रेसवे और तालाब के किनारे जब जमीनी हकीकत सामने आई, तो विकास के दावों पर सवाल खुद-ब-खुद खड़े हो गए।

उज्ज्वला कनेक्शन है, गैस नहीं, उपले बीनती गीता–प्रेमा की कहानी

खेतों और तालाब किनारे सूखे गोबर के उपले बीनती बुजुर्ग महिलाएं आज भी चूल्हा जलाने को मजबूर हैं। उज्ज्वला योजना के कनेक्शन होने के बावजूद गैस भरवाने के पैसे नहीं। गीता और प्रेमा की यह मार्मिक कहानी सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के फर्क को उजागर करती है।

दोपहर की धूप में ठिठकते कदम

दोपहर के लगभग 12 बजे थे। कोहरा छंट चुका था और हल्की गुनगुनी धूप फैली हुई थी। तभी ढका गांव की ओर से गंगा एक्सप्रेसवे के नीचे बनी पुलिया पार करती दो वृद्ध महिलाएं नजर आईं ... गीता और प्रेमा। हाथों में फटी प्लास्टिक की बोरी और दरांती। कमजोर शरीर, थके कदम। यह दृश्य देखकर बरबस ही कदम ठिठक गए।

बातचीत में खुली गरीबी की परतें

बातचीत शुरू हुई तो जो कहानी सामने आई, उसने मानवीय संवेदना को भीतर तक झकझोर दिया। दो जून की रोटी के लिए ये महिलाएं खेतों, चारागाहों और तालाब किनारे सूखे गोबर के उपले बीनती हैं। दरांती से सूखी झाड़ियों की खरपतवार काटती हैं और उसी से चूल्हा जलता है। यही आज इनके जीवन का सच है।

उज्ज्वला है, लेकिन रसोई धुएं से भरी

सरकार की उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन जरूर मिला है, लेकिन गैस सिलेंडर भरवाने की हैसियत नहीं। नतीजतन रसोई में आज भी गोबर की कंडियों और लकड़ियों का धुआं भरा रहता है। योजनाएं कागजों में पूरी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस।

गीता की कहानी : जमीन गई, मुआवजा नहीं

गीता के पति रतीराम शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हैं। परिवार की साढ़े छह बीघा जमीन गंगा एक्सप्रेसवे में चली गई। श्वसुर के निधन के बाद जमीन चारों बेटों के नाम वरासत में दर्ज हो चुकी है, लेकिन आज तक मुआवजा नहीं मिला। भूमिहीन होने के बाद मजदूरी ही जीवन का एकमात्र सहारा रह गया है।

प्रेमा की खामोश जद्दोजहद

प्रेमा भी उसी पीड़ा की दूसरी तस्वीर हैं। उम्र ढल चुकी है, शरीर जवाब देने लगा है, लेकिन पेट की आग बुझाने के लिए झाड़ियों से लकड़ी बीनना मजबूरी है। उनकी आंखों में शिकायत नहीं, सिर्फ थकान और बेबसी है। गीता कहती है, बेटे बाहर मजदूरी करके परिवार पाल रहे। वह खुद अपनी रोजी रोटी के लिए कंडिया यानी उपले तथा लकडियां बीन कर घर का चूल्हा चलाती, बोली राशन, कोटा से मिल जाता, इसलिए रूखी सुखी खाकर किसी तरह जिंदगी कट रही है।

एक गांव नहीं, पूरे ग्रामीण भारत का सच

ढका गांव की गीता और प्रेमा कोई अपवाद नहीं हैं। लगभग हर गांव में ऐसी महिलाएं मिल जाएंगी, जिनके हाथ में फटी बोरी होती है और नजर जमीन पर... उपलों और लकड़ियों की तलाश में। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच गरीबी आज भी कराह रही है।

अरबों की रफ्तार, गरीबों की बदहाली

जिन गरीबों की जमीन से गंगा एक्सप्रेसवे निकला, उसी परियोजना से बड़े कॉरपोरेट, जिनमें अडानी ग्रुप जैसे नाम शामिल हैं, अरबों-खरबों कमा रहे हैं। लेकिन जिनकी जमीन गई, वे आज भी मुआवजे और रोजी-रोटी के लिए भटक रहे हैं।

सवाल जो व्यवस्था से जवाब मांगते हैं

क्या यही है असली भारत?

क्या विकास सिर्फ सड़कों और पुलों का नाम है?

क्या गरीबों की थाली विकास की तस्वीर में शामिल है?

ढका गांव की यह कहानी विकास के उन दावों पर सीधा सवाल है, जो मंचों और फाइलों में चमकते हैं, लेकिन जमीन पर फीके पड़ जाते हैं।



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