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बांग्लादेश चुनाव 2026: क्या है 17 साल बाद लौटे तारिक रहमान का 'मास्टरस्ट्रोक'?

क्या बांग्लादेश चुनाव में 17 साल बाद लौटे तारिक रहमान ने किसानों की कर्ज माफी और 'बांग्लादेश फर्स्ट' की विदेश नीति का दांव चलकर हलचल मचा दी है?

बांग्लादेश चुनाव 2026: क्या है 17 साल बाद लौटे तारिक रहमान का मास्टरस्ट्रोक?
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नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले ऐतिहासिक चुनावों के पहले सियासत काफी गर्म हो चुकी है। 17 साल के लंबे निर्वासन के बाद बीएनपी (BNP) प्रमुख तारिक रहमान ने किसानों की कर्ज माफी, रोजगार और 'बांग्लादेश फर्स्ट' की नीति के तहत एक ऐसा चुनावी दांव खेला है, जो भारतीय चुनावों की याद दिलाता है। अवामी लीग के न होने पर क्या तारिक का यह 'लोकप्रिय एजेंडा' उन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाएगा?

बांग्लादेश की राजनीति इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर कदम इतिहास बना रहा है। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद 12 फरवरी के चुनाव सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बांग्लादेश के भविष्य का निर्णय हैं। इस मुकाबले में सबसे बड़ा चेहरा बने हैं खालिदा जिया के बेटे और बीएनपी के चेयरपर्सन तारिक रहमान। तारिक ने अपने प्रचार में उन मुद्दों को उठाया है जो सीधे आम आदमी से जुड़े हैं।

किसानों के लिए 'कर्ज माफी' का बड़ा दांव

जैसे भारत के राज्यों में चुनाव जीतने के लिए किसानों की कर्ज माफी को सबसे प्रभावी हथियार माना जाता है, ठीक वही फार्मूला अब तारिक रहमान ने राजशाही की धरती से अपना लिया है। तारिक ने कहा है कि अगर बीएनपी सत्ता में आती है, तो किसानों का 10,000 टका तक का कृषि ऋण ब्याज समेत माफ कर दिया जाएगा।

यह सिर्फ एक घोषणा नहीं, बल्कि ग्रामीण वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने की एक अच्छी रणनीति है। तारिक का कहना है कि उन्होंने इस पर पूरी योजना बना ली है और उनकी सरकार बनते ही सबसे पहली प्राथमिकता अन्नदाताओं को राहत देने की होगी। साथ ही, उन्होंने पद्मा बैराज के निर्माण का वादा कर कृषि क्षेत्र में बड़ी क्रांति लाने की बात कही है।

विकास का 'इंडियन मॉडल' और आईटी पार्क का सपना

तारिक रहमान की वादों की लिस्ट में सिर्फ सब्सिडी ही नहीं, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी भी शामिल है। उन्होंने उत्तरी बांग्लादेश के विकास के लिए कई बड़े वादे किए हैं:

कोल्ड स्टोरेज: राजशाही और चपैनवाबगंज में आम उत्पादकों के लिए बड़े कोल्ड स्टोरेज का निर्माण।

आईटी पार्क: बंद पड़े आईटी पार्कों को फिर से शुरू करके युवाओं को स्किल ट्रेनिंग और रोजगार देना।

कृषि आधारित उद्योग: स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के लिए उद्यमियों को विशेष सहायता।

बारिंद प्रोजेक्ट: पिछले 16 सालों से ठप पड़े 'बारिंद मल्टीपर्पस डेवलपमेंट अथॉरिटी' को 1000 करोड़ के बजट के साथ पुनर्जीवित करना।

"अगर प्रजातंत्र नहीं बचा, तो मेगा प्रोजेक्ट्स तो होंगे, लेकिन वे जनता के लिए नहीं होंगे।" – तारिक रहमान

विदेश नीति: न दिल्ली, न रावलपिंडी... सिर्फ 'बांग्लादेश फर्स्ट'

तारिक रहमान ने विदेश नीति पर एक चौंकाने वाला और मजबूत रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बीएनपी की सरकार किसी विदेशी दबाव में नहीं झुकेगी। उनका नारा है— "न दिल्ली, न रावलपिंडी, हमारी प्राथमिकता सिर्फ बांग्लादेश।"

यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और पाकिस्तान दोनों को एक कड़ा संदेश दे रहा है। तारिक खुद को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में पेश कर रहे हैं, जो बांग्लादेश की संप्रभुता और जनता के हितों को सबसे ऊपर रखता है। उनका यह 'अकाउंटेबल गवर्नेंस' का वादा उन लोगों को लुभा रहा है जो वर्षों से भ्रष्टाचार और सत्ता के दमन से परेशान हैं।

हिंसा के साए में चुनाव और अवामी लीग का 'ब्लैकआउट'

बांग्लादेश के ये चुनाव बिना किसी मुख्य विपक्षी (अवामी लीग) के हो रहे हैं। शेख हसीना की पार्टी को प्रतिबंधित किया गया है, उनके नेताओं पर हत्या के मुकदमे चल रहे हैं और हसीना खुद देश से बाहर हैं। ऐसे में फील्ड बीएनपी और जमात-ए-इस्लाम जैसी पार्टियों के लिए खुला है।

हालांकि, वहां हिंसा की चुनौतियां भी हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के दौरान भी राजनीतिक हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरें बंद नहीं हो रही हैं। तारिक रहमान ने इस पर सतर्क रहते हुए कहा है कि अगर हिंसा में बीएनपी का नाम आता है, तो वे निष्पक्ष जांच में मदद करेंगे। लेकिन साथ ही उन्होंने 'बैलेट बॉक्स' की रखवाली करने की चेतावनी देकर 2008 जैसे चुनावी 'जादू' (धांधली) से बचने का आह्वान किया है।

क्या रंग लाएंगे तारिक के वादे?

तारिक रहमान का 17 साल बाद लौटना और सीधे जनता की नब्ज पर हाथ रखना उन्हें रेस में सबसे आगे खड़ा कर रहा है। कर्ज माफी और रोजगार के वादे अगर वोटों में तब्दील होते हैं, तो बांग्लादेश में बीएनपी की वापसी तय मानी जा सकती है। लेकिन असली सवाल यही है— क्या हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता के बीच एक निष्पक्ष चुनाव हो पाएगा?


Ajit Kumar Pandey

Ajit Kumar Pandey

पत्रकारिता की शुरुआत साल 1994 में हिंदुस्तान अख़बार से करने वाले अजीत कुमार पाण्डेय का मीडिया सफर तीन दशकों से भी लंबा रहा है। उन्होंने दैनिक जागरण, अमर उजाला, आज तक, ईटीवी, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंट और दैनिक जनवाणी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में फील्ड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक अपनी सेवाएं दीं हैं। समाचार लेखन, विश्लेषण और ग्राउंड रिपोर्टिंग में निपुणता के साथ-साथ उन्होंने समय के साथ डिजिटल और सोशल मीडिया को भी बख़ूबी अपनाया। न्यू मीडिया की तकनीकों को नजदीक से समझते हुए उन्होंने खुद को डिजिटल पत्रकारिता की मुख्यधारा में स्थापित किया। करीब 31 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ अजीत कुमार पाण्डेय आज भी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनहित, राष्ट्रहित और समाज की सच्ची आवाज़ बनने के मिशन पर अग्रसर हैं।

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