बांग्लादेश चुनाव: ढाका में अमेरिकी दूत की गुप्त बैठकें, क्या जमात को सत्ता सौंपने की है तैयारी?
बांग्लादेश चुनाव 2026 में अमेरिकी हस्तक्षेप क्यों चरम पर है। क्या नाहिद इस्लाम और जमात का गठबंधन अमेरिका की मदद से सत्ता हासिल कर पाएगा?

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । ढाका में सियासी माहौल अब एक अहम मोड़ पर पहुंच चुका है। अमेरिकी राजदूत ब्रेंट क्रिस्टेंसन और जमात-ए-इस्लामी के अमीर की गुप्त मुलाकातें बांग्लादेश की राजनीति को हिलाकर रख रही हैं। क्या वाशिंगटन इस दक्षिण एशियाई देश में अपनी पसंद का शासन स्थापित करने की कोशिश कर रहा है? आइए जानते हैं इस अंदर की कहानी को।
बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव से पहले, राजधानी ढाका बिलकुल जासूसी फिल्म के सेट जैसी नजर आ रही है। चुनाव प्रचार का शोर तो है, लेकिन बंद कमरों में कुछ और ही चल रहा है। पिछले सात दिन में, अमेरिकी राजदूत ब्रेंट टी. क्रिस्टेंसन ने जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान से दो बार मुलाकात की।
ये मुलाकातें केवल औपचारिकता नहीं हैं। सूत्रों के मुताबिक, गुरुवार (29 जनवरी) को हुई बैठक में नई सरकार की रूपरेखा और संभावित कैबिनेट के चेहरों पर चर्चा हुई। सवाल ये है कि अमेरिका जो लोकतंत्र की बात करता है, वो एक कट्टरपंथी ताकत की तरफ क्यों झुक रहा है, जिसे पहले पाकिस्तान का करीबी माना जाता था?
स्टीवन बैरी जेम्स: सुरक्षा सलाहकार या रणनीतिक मोहरा?
अमेरिकी दखल सिर्फ राजनेताओं तक सीमित नहीं है। अमेरिका के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार स्टीवन बैरी जेम्स भी ढाका में मौजूद हैं। 27 जनवरी को जेम्स की सेना के कमांडर के साथ मुलाकात ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है।
क्या अमेरिका चुनाव के बाद संभावित विद्रोह को रोकने के लिए सेना को विश्वास में ले रहा है? या फिर यह सरकार के पतन के बाद 'पावर वैक्यूम' को भरने की तैयारी है?
जमात और नाहिद इस्लाम: अमेरिका का नया 'पावर कपल'
इस बार का समीकरण काफी दिलचस्प है। बीएनपी (BNP) 7 पार्टियों के साथ मैदान में है, जबकि जमात-ए-इस्लामी ने नाहिद इस्लाम की पार्टी एनसीपी (NCP) के साथ हाथ मिलाया है।
नाहिद इस्लाम: जुलाई आंदोलन का पोस्टर बॉय और शेख हसीना के तख्तापलट का मुख्य रणनीतिकार।
अमेरिकी झुकाव: अमेरिका नाहिद इस्लाम के युवा जोश और जमात के कार्यकर्ताओं के मेल को एक 'स्थिर विकल्प' के रूप में देख रहा है।
वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट भी इसका समर्थन करती है कि अमेरिका अब जमात के साथ अपने रिश्तों को सुधारकर उसे एक मुख्यधारा की राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करना चाहता है।
क्या अगस्त 2024 की हिंसा एक सुनियोजित पटकथा थी?
जब अगस्त 2024 में शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा, तो उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि ढाका में भड़की हिंसा में विदेशी ताकतों और जमात का हाथ है। अमेरिका ने इन आरोपों का कभी खंडन नहीं किया, लेकिन हालिया गतिविधियां उन दावों को और मजबूत कर रही हैं।
जमात पर आरोप लगते रहे हैं कि उसने आंदोलन का सहारा लेकर अराजकता फैलाई। अब वही जमात अमेरिका के समर्थन से सत्ता की ओर बढ़ने की तैयारी में है।
बीएनपी बनाम जमात: अपनों के बीच की जंग
12 फरवरी के चुनाव में असली मुकाबला बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच ही होगा। नागरिक ओइका और गणो अधिकार परिषद जैसी पार्टियां बीएनपी के साथ हैं, लेकिन अमेरिका का समर्थन फिलहाल जमात के साथ ज्यादा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका को लगता है कि बीएनपी को संभालना मुश्किल होगा, जबकि जमात और नाहिद इस्लाम का गठबंधन उसकी क्षेत्रीय रणनीतियों के लिए ज्यादा फायदेमंद होगा।
क्या भारत के लिए यह खतरे की घंटी है?
बांग्लादेश में अमेरिका का यह 'माइक्रो-मैनेजमेंट' नई दिल्ली के लिए चिंता का कारण बन गया है। जमात का सत्ता में आना, ढाका में पाकिस्तान और चीन के प्रभाव का फिर से बढ़ना है। अगर अमेरिका अपनी योजना में सफल होता है, तो दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल सकता है।
क्या बांग्लादेश की जनता इस विदेशी हस्तक्षेप को स्वीकार करेगी या 12 फरवरी का जनादेश कुछ और ही कहानी लिखेगा? यह देखना अभी बाकी है।


