ईरान के लिए 'ढाल' बने मुस्लिम देश, ट्रंप की धमकियों के बीच पलटी बाजी
क्या ईरान पर अमेरिकी हमले की आहट के बीच यूएई ने अपनी जमीन और एयरस्पेस के इस्तेमाल पर रोक लगाई है। क्या टल जाएगा महायुद्ध?

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । मिडल ईस्ट में युद्ध के बादलों के बीच यूएई (UAE) ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने वाशिंगटन से लेकर तेहरान तक हलचल मचा दी है। ट्रंप की 'अटैक' वाली धमकियों के बीच इस मुस्लिम देश ने साफ कर दिया है कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ नहीं होने देगा। जानिए इस बड़े यू-टर्न के पीछे की इनसाइड स्टोरी।
खाड़ी देशों की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया है। जहां एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को कड़े सबक सिखाने की बात कर रहे हैं, वहीं अमेरिका के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अपनी सीमाएं ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए बंद कर दी हैं।
यूएई के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यूएई अपने हवाई क्षेत्र (Airspace), जमीन या समुद्री क्षेत्रों का उपयोग ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य हमले के लिए नहीं करने देगा।
सोचने वाली बात: क्या यह ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' रणनीति को तगड़ा झटका है? आखिर क्यों एक करीबी दोस्त ने ऐन वक्त पर अमेरिका का साथ देने से इनकार कर दिया?
USS अब्राहम लिंकन और 'ड्रोन स्वार्म' का खौफ
तनाव की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका का घातक USS अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप हिंद महासागर के सेंटकॉम (CENTCOM) क्षेत्र में पहुंच चुका है। लेकिन यहां एक ट्विस्ट है।
ड्रोन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ईरान के पास 'ड्रोन स्वार्म' (ड्रोन का झुंड) तकनीक है, जो पलक झपकते ही किसी भी बेड़े को तबाह कर सकती है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे फिलहाल पूरी तरह युद्ध के मूड में नहीं हैं, लेकिन ट्रंप के तेवर कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
क्यों भड़के हैं डोनाल्ड ट्रंप?
ईरान में हाल के दिनों में हुए हिंसक प्रदर्शनों ने आग में घी डालने का काम किया है। रिपोर्टों के अनुसार, इन प्रदर्शनों के दमन में करीब 30,000 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। मानवाधिकारों के इस हनन को आधार बनाकर ट्रंप प्रशासन ईरान पर सीधा प्रहार करने की योजना बना रहा था।
पिछले हफ्ते ट्रंप ने खुद कहा था कि एक नौसैनिक बेड़ा ईरान की ओर बढ़ रहा है। लेकिन इस बार खाड़ी के देशों ने अमेरिका को 'चेक और मेट' कर दिया है।
सऊदी, कतर और ओमान: एकजुट हुआ मिडल ईस्ट?
सिर्फ यूएई ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब, कतर और ओमान ने भी अमेरिका के हाथ खींचने की कोशिश की है।
सऊदी अरब का तर्क: सऊदी अधिकारियों ने ट्रंप को सलाह दी है कि वे 'सत्ता परिवर्तन' (Regime Change) की कोशिश न करें।
डर क्या है? खाड़ी देशों को डर है कि अगर ईरान पर हमला हुआ, तो पूरा क्षेत्र जल उठेगा और इसका सीधा फायदा ईरानी शासन को ही मिलेगा, जो जनता का ध्यान भटकाने में सफल हो जाएंगे।
मिस्र और पाकिस्तान की भूमिका: कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मिस्र और पाकिस्तान ने भी पर्दे के पीछे से तनाव कम करने के लिए मध्यस्थता की है।
ईरान-अमेरिका विवाद के बीच 'न्यूट्रल' रहने की मजबूरी
यूएई का यह फैसला केवल ईरान के प्रति प्रेम नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने की एक बड़ी चाल है। दुबई और अबू धाबी जैसे व्यापारिक केंद्र युद्ध की स्थिति में सबसे पहले प्रभावित होंगे। यूएई ने साफ कर दिया है कि वह 'तटस्थ' (Neutral) बना रहेगा।
क्या होगा अगला कदम? विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप अब ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों को और कड़ा कर सकते हैं, क्योंकि सैन्य रास्ते में उनके अपने ही सहयोगियों ने दीवार खड़ी कर दी है।
मिडल ईस्ट की यह बिसात अब और पेचीदा हो गई है। एक तरफ ट्रंप की जिद है और दूसरी तरफ अपने अस्तित्व को बचाने में जुटे खाड़ी देश। यूएई का यह कदम साबित करता है कि अब मुस्लिम देश अमेरिका के हर फैसले पर 'जी हुजूर' कहने के मूड में नहीं हैं।


