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ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव: क्या भारत बन सकेगा शांति का दूत?

ईरान और अमेरिका के बीच संकट के बीच मुंबई में भारतीय डिप्टी NSA और ईरानी अधिकारी अली लारीजानी की मीटिंग ने क्यों हलचल मचा दी है?

ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव: क्या भारत बन सकेगा शांति का दूत?
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नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । ईरान और अमेरिका के बीच का परमाणु विवाद अब अत्यंत गंभीर परिस्थिति में पहुंच गया है। ट्रंप की 'मिडनाइट हैमर' की धमकी और मुंबई में ईरानी प्रतिनिधि अली लारीजानी की भारतीय डिप्टी NSA से गोपनीय बैठक ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। क्या भारत इस महागंभीर स्थिति में शांति स्थापित करने वाला बन सकेगा?

दुनिया की नजरें इस समय मध्य पूर्व पर टिकी हुई हैं। एक ओर वॉशिंगटन से डोनाल्ड ट्रंप की आवाज सुनाई दे रही है, तो दूसरी तरफ मुंबई में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम उठाया गया है, जिसने ग्लोबल एक्सपर्ट्स का ध्यान खींचा है।

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का सचिव अली लारीजानी मुंबई में भारत के डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर पवन कपूर से मिले। यह कोई सामान्य शिष्टाचार भेंट नहीं थी। यह चर्चा तब हुई है जब ईरान पर अमेरिका का हमला संभावित है।

लेकिन सवाल यह है कि ईरान ने अपनी बातें कहने के लिए भारत को क्यों चुना? क्या मुंबई में इस बैठक ने युद्ध टालने का कोई गुप्त उपाय निकाला है?

डोनाल्ड ट्रंप की धमकी: 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' का खतरा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक स्वभाव जगजाहिर है। हाल ही में उन्होंने 'ट्रुथ सोशल' पर एक ऐसा संदेश पोस्ट किया जिसने तेहरान से लेकर दिल्ली तक हलचल पैदा कर दी। ट्रंप ने साफ कहा कि एक बड़ा अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा ईरान की ओर बढ़ रहा है।

"समय खत्म हो रहा है। ईरान को बातचीत के लिए आगे आना होगा, नहीं तो परिणाम 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' से भी भयानक होंगे।" — डोनाल्ड ट्रंप

ट्रंप के इस बयान का साफ मतलब है: या तो परमाणु हथियारों से दूरी बनाओ और बातचीत करो, या फिर एक ऐसी हिंसक कार्रवाई का सामना करो जो दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी। ट्रंप की इस चेतावनी ने ईरान को बैकफुट पर धकेलने के बजाय भारत जैसे पुराने दोस्त की ओर देखने के लिए मजबूर कर दिया है।

ईरान-भारत मीटिंग के तीन महत्वपूर्ण बिंदु

इस उच्च स्तरीय बैठक के पीछे कुछ गहरे कूटनीतिक अर्थ हैं:

मध्यस्थ के रूप में भारत: भारत के अमेरिका और ईरान दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। ईरान चाहता है कि भारत अपनी सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल कर ट्रंप प्रशासन को शांत करे।

चाबहार और रणनीतिक हित: भारत का चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट ईरान में लगा है। अगर वहां युद्ध होता है, तो भारत के अरबों डॉलर डूब सकते हैं।

ऊर्जा सुरक्षा: ईरान लंबे समय से भारत का तेल का पारंपरिक स्रोत रहा है। अगर तनाव बढ़ता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ेगा।

क्या ईरान झुकने को तैयार है?

तेहरान ने अब तक अपनी स्थिति को कमजोर नहीं किया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि वे किसी भी हमले का जवाब देने के लिए तैयार हैं। फिर भी, अली लारीजानी का भारत आना इस बात का संकेत है कि ईरान पर्दे के पीछे कोई 'निकलने का रास्ता' सर्च कर रहा है।

ईरान समझता है कि ट्रंप की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति उसे आर्थिक रूप से तोड़ सकती है। ऐसे में, भारत एक ब्रिज का काम कर सकता है, जो वॉशिंगटन और तेहरान के बीच संवाद को खोल सके।

विशेषज्ञों की राय: क्या यह तीसरे विश्व युद्ध का संकेत है?

भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप केवल दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं। वे चाहते हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से बंद करे। लेकिन अगर ईरान ने कोई गलती की, तो ट्रंप अपनी चेतावनी को अंजाम देने में देर नहीं करेंगे।

मुंबई की इस मीटिंग में पवन कपूर और लारीजानी के बीच निश्चित रूप से इस 'डेडलाइन' पर चर्चा हुई होगी। भारत ने हमेशा शांति का समर्थन किया है, पर क्या ट्रंप मोदी की बात मानेंगे? यह कुछ हफ्तों में स्पष्ट होगा।

दुनिया एक चौराहे पर खड़ी है। एक ओर ट्रंप का अहंकार और शक्ति प्रदर्शन है, तो दूसरी ओर ईरान की अपनी संप्रभुता बचाने की जिद। मुंबई में हुई यह गुप्त बातचीत इस बात की गवाह है कि भारत अब वैश्विक संकटों में केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि एक निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है।

क्या भारत इस बार भी 'बौद्ध और गांधी' की धरती से शांति का संदेश फैला पाएगा, या फिर ट्रंप का नौसैनिक बेड़ा इतिहास का एक नया काला अध्याय लिखेगा?


Ajit Kumar Pandey

Ajit Kumar Pandey

पत्रकारिता की शुरुआत साल 1994 में हिंदुस्तान अख़बार से करने वाले अजीत कुमार पाण्डेय का मीडिया सफर तीन दशकों से भी लंबा रहा है। उन्होंने दैनिक जागरण, अमर उजाला, आज तक, ईटीवी, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंट और दैनिक जनवाणी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में फील्ड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक अपनी सेवाएं दीं हैं। समाचार लेखन, विश्लेषण और ग्राउंड रिपोर्टिंग में निपुणता के साथ-साथ उन्होंने समय के साथ डिजिटल और सोशल मीडिया को भी बख़ूबी अपनाया। न्यू मीडिया की तकनीकों को नजदीक से समझते हुए उन्होंने खुद को डिजिटल पत्रकारिता की मुख्यधारा में स्थापित किया। करीब 31 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ अजीत कुमार पाण्डेय आज भी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनहित, राष्ट्रहित और समाज की सच्ची आवाज़ बनने के मिशन पर अग्रसर हैं।

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