Top
Begin typing your search above and press return to search.

अमेरिका-ईरान युद्ध की आहट: क्या तुर्की बनेगा 'संकटमोचक'

क्या अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध टालने के लिए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने मध्यस्थता शुरू की है। क्या अंकारा की यह बैठक जंग रोक पाएगी?

अमेरिका-ईरान युद्ध की आहट: क्या तुर्की बनेगा संकटमोचक
X

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । ट्रंप की सैन्य चेतावनियों और ईरान के अडिग रुख के बीच तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन ने मध्यस्थता की कमान संभाली है। क्या अंकारा में होने वाली यह बैठक दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचा पाएगी? जानें तुर्की के इस 'पीस मिशन' के पीछे का असली डर और कूटनीति।

पश्चिम एशिया के आसमान में एक बार फिर बारूद की गंध महसूस हो रही है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप की 'सीधे हमले' की धमकी है, वहीं दूसरी ओर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर अडिग खड़ा है। इस बीच, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोआन ने एक चौंकाने वाले किरदार के तौर पर सामने आकर बीच में कूदने का फैसला किया है।

जब दो महाशक्तियां आमने-सामने हों, तो तुर्की का इस खींचतान में शामिल होना सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का अंकारा दौरा इस बात का इशारा है कि पर्दे के पीछे कुछ बड़ा घटित हो रहा है।

आखिर तुर्की को किस बात का डर है?

यह सवाल जरूर उठता है कि एर्दोआन अपनी पूरी राजनीतिक ताकत इस तनाव को कम करने में क्यों लगा रहे हैं? इसके पीछे की वजह भूगोल और इतिहास में छिपी हुई है।

सीमा पर तबाही का खौफ: तुर्की और ईरान की सीमाएं आपस में मिलती हैं। अगर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध होता है, तो तुर्की का बॉर्डर क्षेत्र सबसे पहले प्रभावित होगा। एर्दोआन को यह अच्छी तरह से पता है कि एक भी मिसाइल अगर लक्ष्य से भटकती है, तो आग उनके दरवाजे तक पहुंच सकती है।

शरणार्थियों का सैलाब: सीरिया युद्ध के दौरान तुर्की ने लाखों शरणार्थियों को आश्रय दिया, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ा। यदि ईरान में अस्थिरता आती है, तो तुर्की को एक और बड़े 'रफ्यूजी क्राइसिस' का सामना करना पड़ेगा, जिसे संभालना उसके लिए मुश्किल होगा।

अर्थव्यवस्था की कमर: ईरान तुर्की का महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है। युद्ध के चलते तुर्की को ऊर्जा संकट और व्यापारिक रूट में रुकावट का सामना करना पड़ेगा।

एर्दोआन का मास्टरप्लान: ट्रंप और पेज़ेशकियान की वीडियो कॉल

तुर्की ने इस तनाव को कम करने के लिए एक ऐसा प्रस्ताव पेश किया है जिसने कूटनीतिज्ञों को हैरान कर दिया है। एर्दोआन चाहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान के बीच एक डायरेक्ट वीडियो कॉन्फ्रेंस हो।

पिछले एक दशक में अमेरिका और ईरान ने सीधे बातचीत नहीं की, अब क्या वे एक स्क्रीन पर मिलेंगे? एर्दोआन का मानना है कि 'फेस-टू-फेस' बातचीत ही गलतफहमियों को सुलझा सकती है। हालांकि, वॉशिंगटन से इस प्रस्ताव पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

ट्रंप की 'डेडलाइन' और ईरान की 'शर्त'

डोनाल्ड ट्रंप का मिजाज सभी को पता है। उन्होंने साफ कहा है कि अगर ईरान ने अपने परमाणु हथियारों पर अपनी जिद नहीं छोड़ी, तो अमेरिका "इंतज़ार" नहीं करेगा। ट्रंप का संदेश एकदम स्पष्ट है: या तो मेज पर आओ या फिर मैदान में।

वहीं, ईरान ने भी अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं। तेहरान का कहना है कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन 'सम्मान और बराबरी' के आधार पर। ईरान किसी भी दबाव में झुकने को तैयार नहीं है। अब अंकारा में होने वाली बैठक में तुर्की के राजनयिक ईरान को समझाने की कोशिश करेंगे कि परमाणु कार्यक्रम पर थोड़ी 'लचक' दिखाना देश के हित में होगा।

क्या तुर्की बन पाएगा नया 'पावर सेंटर'?

एर्दोआन की यह कोशिश सिर्फ शांति के लिए नहीं है, बल्कि तुर्की को वैश्विक मंच पर एक अनिवार्य खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की भी है। अगर एर्दोआन इस टकराव को टालने में सफल रहे, तो वे न केवल अपने देश को बचाएंगे, बल्कि मुस्लिम दुनिया के सबसे बड़े नेता के रूप में भी उभरेंगे।

अमेरिका और ईरान के बीच की यह तनातनी एक बारूदी सुरंग की तरह है, जिस पर पूरी दुनिया बैठी है। तुर्की इस सुरंग को डिफ्यूज करने की कोशिश कर रहा है। क्या एर्दोआन का यह 'पीस मिशन' सफल होगा या ट्रंप के जिद और ईरान के आत्मसम्मान की टकराहट दुनिया को एक नए संघर्ष की ओर ले जाएगी? अगले 48 घंटे बेहद निर्णायक होने वाले हैं।


Ajit Kumar Pandey

Ajit Kumar Pandey

पत्रकारिता की शुरुआत साल 1994 में हिंदुस्तान अख़बार से करने वाले अजीत कुमार पाण्डेय का मीडिया सफर तीन दशकों से भी लंबा रहा है। उन्होंने दैनिक जागरण, अमर उजाला, आज तक, ईटीवी, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंट और दैनिक जनवाणी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में फील्ड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक अपनी सेवाएं दीं हैं। समाचार लेखन, विश्लेषण और ग्राउंड रिपोर्टिंग में निपुणता के साथ-साथ उन्होंने समय के साथ डिजिटल और सोशल मीडिया को भी बख़ूबी अपनाया। न्यू मीडिया की तकनीकों को नजदीक से समझते हुए उन्होंने खुद को डिजिटल पत्रकारिता की मुख्यधारा में स्थापित किया। करीब 31 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ अजीत कुमार पाण्डेय आज भी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनहित, राष्ट्रहित और समाज की सच्ची आवाज़ बनने के मिशन पर अग्रसर हैं।

Related Stories
Next Story
All Rights Reserved. Copyright @2019
Powered By Hocalwire