Top
Begin typing your search above and press return to search.

Noida News: 80 रेस्क्यूकर्मियों की मौजूदगी भी Yuvraj को नहीं बचा पाई

नोएडा सेक्टर-150 में युवराज मेहता की मौत ने आपातकालीन रेस्क्यू सिस्टम की पोल खोल दी। 80 से ज्यादा रेस्क्यूकर्मी सॉफ्टवेयर इंजीनियर ‌की जान नहीं बचा पाए।

Noida News: 80 रेस्क्यूकर्मियों की मौजूदगी भी Yuvraj को नहीं बचा पाई
X

नोएडा, वाईबीएन न्यूज। सेक्टर-150 में 16 जनवरी की रात हुआ हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि देश की आपातकालीन राहत और रेस्क्यू व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला बन गया है। पानी से भरे गहरे गड्ढे में कार समेत फंसे 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत उस वक्त हो गई, जब मौके पर पुलिस, फायर ब्रिगेड, SDRF और NDRF समेत करीब 80 रेस्क्यूकर्मी मौजूद थे।

पीआरवी 9 मिनट में मौके पर पहुंच गई थी

युवराज ने रात करीब 12 बजे मदद के लिए चीख-पुकार की। सबसे पहले उनके पिता राज मेहता को फोन पर SOS मिला, जिन्होंने तुरंत 112 पर सूचना दी। पुलिस की PRV टीम 9 मिनट में मौके पर पहुंच गई। इसके बाद फायर ब्रिगेड, SDRF और अंत में NDRF भी घटनास्थल पर आ गई। इतना सब होने के बावजूद युवराज को बचाया नहीं जा सका।

दो घंटे तक जूझता रहा युवराज

बताया जा रहा है कि युवराज को तैरना नहीं आता था, फिर भी वह रात करीब 1:30 बजे तक कार के सहारे खुद को पानी में संभाले रहा। उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर मदद के लिए इशारे भी किए, लेकिन घने कोहरे और अंधेरे में वह नाकाफी साबित हुआ। अंततः उसकी आवाज बंद हो गई और वह पानी में डूब गया।

“और ढह गया पूरा सिस्टम”

युवराज के पिता राज मेहता ने इस मौत को “Institutional Failure” बताया। पूर्व यूपी डीजीपी विक्रम सिंह ने भी इस घटना को सिस्टम के पूरी तरह ढह जाने का उदाहरण बताया। उनका कहना है कि इतने लोगों की मौजूदगी के बावजूद युवक की जान न बच पाना, कौशल, उपकरण और नेतृत्व, तीनों की कमी को दर्शाता है।

पहले रिस्पॉन्डर की तैयारी पर सवाल

पुलिस सबसे पहले मौके पर पहुंची थी। रस्सियां फेंकी गईं, लेकिन कोई भी पानी में उतरने को तैयार नहीं हुआ। पुलिस सूत्रों ने तैरना न आने और ठंडे पानी को कारण बताया। हालांकि, यूपी पुलिस ट्रेनिंग अकादमी के अधिकारियों के अनुसार, SI और ASI स्तर तक के पुलिसकर्मियों को तैराकी और आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाता है। पूर्व डीजीपी ओपी सिंह ने कहा कि यह केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और पेशेवर तैयारी की भी कमी थी। उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक डिलीवरी बॉय जान जोखिम में डालकर पानी में कूद सकता है, तो प्रशिक्षित बल क्यों नहीं?

उपकरणों की भारी कमी

PRV वाहनों में रस्सी, टॉर्च, हेलमेट और फर्स्ट एड किट तो होती है, लेकिन लाइफ जैकेट जैसे जरूरी उपकरण नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि खुले नाले और गड्ढों वाले शहरों में यह गंभीर चूक है। रेस्क्यू के लिए जरूरी ऑक्सीजन सिलेंडर, लाइफ सपोर्ट सिस्टम और फोल्डिंग बोट्स की भी कमी सामने आई।

एजेंसियों में तालमेल की कमी

फायर ब्रिगेड करीब 45 मिनट बाद पहुंची, जबकि NDRF को लगभग दो घंटे लगे। SDRF की टीम गाजियाबाद से आई, क्योंकि नोएडा में SDRF यूनिट तैनात नहीं है। हर एजेंसी अपने-अपने दायरे में काम करती रही, लेकिन एकीकृत कमांड सिस्टम नहीं दिखा। पूर्व अधिकारियों का कहना है कि मौके पर कोई एक वरिष्ठ अधिकारी कमान संभालता, तो निर्णय तेजी से लिए जा सकते थे। सेना की तर्ज पर एक नोडल कमांड पोस्ट और जिला स्तर पर विशेष रेस्क्यू यूनिट की जरूरत बताई गई है। यह हादसा सिर्फ युवराज मेहता की मौत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की असफलता है, जो समय पर सही फैसला, सही उपकरण और सही नेतृत्व देने में नाकाम रही। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर राज्यों और जिलों में मजबूत, प्रशिक्षित और सुसज्जित त्वरित रेस्क्यू टीमें होतीं, तो शायद एक युवा की जान बचाई जा सकती थी।


Dhiraj Dhillon

Dhiraj Dhillon

धीरज ढिल्लों दो दशकों से अधिक समय से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने अपने करियर के दौरान दैनिक हिंदुस्तान और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में नोएडा और गाजियाबाद क्षेत्र में गहन रिपोर्टिंग की है। प्रिंट मीडिया के साथ-साथ, उन्होंने डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी काम किया है। उनकी लेखनी में निष्पक्षता, तथ्यपरकता और गहरी विश्लेषण क्षमता स्पष्ट रूप से झलकती है। समसामयिक विषयों के साथ-साथ स्वास्थ्य, जीवनशैली, विकास संबंधी मुद्दों और राजनीति में उनकी गहरी रुचि रही है। उन्होंने पांच वर्षों तक Centre for Advocacy & Research (CFAR) के साथ मिलकर सार्वजनिक स्वास्थ्य संचार कार्य किया है।

Related Stories
Next Story
All Rights Reserved. Copyright @2019
Powered By Hocalwire