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रजा पुस्तकालय में प्रकाश पर्व पर गूंजी गुरुवाणी, शब्द कीर्तन से संगत निहाल

श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के जीवन, बलिदान और आदर्शों पर विद्वानों ने प्रकाश डाला

A Sharma

वाईबीएन संवाददाता, रामपुर। रजा पुस्तकालय एवं संग्रहालय में श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज की जयंती (प्रकाश पर्व) के पावन अवसर पर रंग महल सभागार में एक विशेष संगोष्ठी एवं गुरबाणी (शबद-कीर्तन) कार्यक्रम का गरिमामय एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम हुआ, जिसका शुभारंभ परंपरागत रूप से दीप प्रज्वलन के साथ किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता रामपुर रज़ा पुस्तकालय एवं संग्रहालय के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र ने की। मुख्य अतिथि राज्यमंत्री कृषि, कृषि शिक्षा एवं अनुसंधान बलदेव सिंह औलख रहे। इस अवसर पर गुरबाणी (शबद-कीर्तन) का भावपूर्ण पाठ ज्ञानी सुरजीत सिंह, मुख्य ग्रंथी, गुरुद्वारा सिंह सभा द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसने सभागार में आध्यात्मिक वातावरण उत्पन्न कर दिया। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध कवि डॉ राहुल अवस्थी ने किया

सिख पंथ का इतिहास अत्यंत वैभवशाली : डाॅ पुष्कर मिश्र

पुस्तकालय एवं संग्रहालय के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र ने श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के जीवन, उनके बलिदान, धर्म, मानवता और सामाजिक समरसता के आदर्शों पर प्रकाश डाला। कहा कि उनका व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति और राष्ट्र-चेतना का एक महान प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि शिव का स्मरण करते हुए उन्हें पुराणों में उल्लिखित यह पंक्ति स्मरण आती है— “तन मे मनः शिवः संकल्पम् अस्तु”, अर्थात् ऋषि यह प्रार्थना करता है कि उसका मन सदैव शुभ संकल्पों से युक्त रहे। इसी भाव को श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने अत्यंत सरल और सुंदर शब्दों में इस प्रकार अभिव्यक्त किया—

“देहु शिवा वर मोहि इहे, शुभ करमन ते कबहुँ न टरौं।

न डरौं अरिसौं जब जाइ लरौं, निश्चय कर अपनी जीत करूं।”

डॉ. पुष्कर मिश्र ने आगे कहा कि सिख पंथ का इतिहास अत्यंत वैभवशाली है। सिख समुदाय ने जो त्याग और बलिदान दिए हैं, शायद ही विश्व में किसी अन्य समुदाय ने इस स्तर का बलिदान दिया हो। भारत की जनसंख्या में सिखों की संख्या भले ही दो प्रतिशत से अधिक न हो, किंतु देश और मानवता के लिए उनके बलिदान का योगदान अत्यंत व्यापक रहा है—चाहे वह मुगल काल हो या स्वतंत्रता आंदोलन का दौर। डॉ. मिश्र ने बाबा दीप सिंह जी के अद्वितीय बलिदान का उदाहरण देते हुए कहा कि विश्व के इतिहास में ऐसा साहस और संकल्प दुर्लभ है। उन्होंने उपस्थित सरदार सुदर्शन सिंह खुराना, अध्यक्ष, गुरुद्वारा संत भाई जी बाबा के माध्यम से समस्त गुरुद्वारा प्रबंधनों से आह्वान किया कि सिख पंथ के गौरवशाली इतिहास को गुरुद्वारों की सीमाओं से बाहर निकालकर विश्व के जन-जन तक पहुंचाया जाए।

श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज का जीवन साहस, त्याग और सामाजिक न्याय का संदेश: औलख

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बलदेव सिंह औलख ने अपने संबोधन में श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के साहस, त्याग और सामाजिक न्याय के संदेश को आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष हम श्री गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहीदी शताब्दी मना रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस अवसर पर असम, पटना साहिब, नांदेड़ साहिब, आनंदपुर साहिब तथा लखनऊ आदि स्थानों से अनेक ऐतिहासिक यात्राएं निकाली जा रही हैं, जिनमें से कई यात्राएं रामपुर से होकर भी गुज़री हैं और उनका स्वागत करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक महत्वपूर्ण यात्रा ‘जोड़ा साहिब यात्रा’ भी निकाली गई, जो यहां से होकर नहीं गुज़री। औलख ने कहा कि सिखों और गुरुओं का इतिहास अत्यंत महान है। इतिहास के पन्नों में ऐसा उदाहरण दुर्लभ है कि किसी ने अपने लिए नहीं, बल्कि देश, राष्ट्र, समाज और मानवता के लिए अपने आप को तथा अपने परिवार को बलिदान किया हो। उन्होंने कश्मीरी पंडितों की उस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख किया, जब वे आनंदपुर साहिब पहुंचे और गुरु तेग बहादुर जी से अपने धर्म की रक्षा हेतु निवेदन किया। उस समय गुरु गोविंद सिंह जी मात्र 9 वर्ष के थे, फिर भी उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी से बड़ा और महान गुरु कोई नहीं हो सकता। उन्होंने बताया कि गुरु तेग बहादुर जी को धर्म परिवर्तन के लिए अनेक यातनाएं दी गईं, किंतु उन्होंने अपना शीश अर्पित कर दिया और धर्म की रक्षा की। बाद में वर्ष 1699 में गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर सिखों को एक विशिष्ट पहचान दी तथा अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की।

इन वक्ताओं ने रखे अपने अपने विचार

इस अवसर पर निर्मल सिंह कंग, अध्यक्ष, गुरुद्वारा सिंह सभा, रामपुर ने कहा कि केवल अत्याचारी शासकों के नाम स्मरण करने से कोई सार्थक उद्देश्य सिद्ध नहीं होता, बल्कि हमें अपने गुरुओं और महापुरुषों के आदर्शों को याद करना चाहिए। उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहीदी शताब्दी का उल्लेख करते हुए कहा कि पंडित कृपाराम जी के निवेदन पर गुरु तेग बहादुर जी ने मानवता और धर्म की रक्षा हेतु अद्वितीय बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि गुरु गोविंद सिंह जी ने भी देश और धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया। आज आवश्यकता है कि हम गुरु गोविंद सिंह जी के उपदेशों और उनके दिखाए मार्ग पर चलें तथा उनके आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करें।

इस अवसर पर शिवांजलि के. बरार, अधिवक्ता, दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि मानव जाति एक है और सच्चा धार्मिक वही है जो समस्त मानवता को समान दृष्टि से देखता है। उन्होंने गुरु गोविंद सिंह जी के विचारों को सेक्युलरिज़्म और दूरदर्शिता का प्रतीक बताते हुए कहा कि मात्र 17 वर्ष की आयु में जप साहिब में निराकार ईश्वर की अवधारणा प्रस्तुत करना उनकी अद्वितीय दृष्टि को दर्शाता है। उन्होंने गुरु जी को “कलगीधर पातशाह” और “नीले घोड़े पर सवार” के रूप में स्मरण करते हुए कहा कि उनके हाथ में बैठा बाज स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक था। खालसा पंथ के आदर्श—निर्भीकता, आत्मनिर्भरता और सेवा—आज भी प्रासंगिक हैं।

इस अवसर पर सरदार दर्शन सिंह खुराना, अध्यक्ष, गुरुद्वारा संत भाई जी बाबा, सतनाम सिंह मट्टू, अध्यक्ष, बार एसोसिएशन, चरनजीत सिंह (वंशज, भाई मतीदास जी), मंदीप कौर, पूर्व निदेशक, ऑल इंडिया रेडियो ने विचार व्यक्त किए।

यह भी रहे मौजूद

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में निर्मल सिंह कंग, अध्यक्ष, गुरुद्वारा सिंह सभा, चरनजीत सिंह (वंशज, भाई मतीदास जी), बिलासपुर, मंदीप कौर, पूर्व निदेशक, ऑल इंडिया रेडियो, सतनाम सिंह मट्टू, अध्यक्ष, बार एसोसिएशन, सरदार दर्शन सिंह खुराना, अध्यक्ष, गुरुद्वारा संत भाई जी बाबा तथा शिवांजलि के. बरार, एडवोकेट, दिल्ली हाईकोर्ट उपस्थित रहे।


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