पांच साल से निष्क्रिय सूचना आयोग, हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार हरकत में
मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं होने से बाधित है आरटीआई की द्वितीय अपील, अवमानना की चेतावनी के बाद सरकार ने दिया भरोसा

रांची वाईबीएन डेस्क : झारखंड में सूचना का अधिकार कानून के क्रियान्वयन की रीढ़ माने जाने वाला सूचना आयोग पिछले कई वर्षों से लगभग ठप पड़ा है। मई 2020 के बाद से न तो मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति हुई और न ही किसी सूचना आयुक्त को जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके चलते आरटीआई के तहत दायर द्वितीय अपीलों का निपटारा पूरी तरह बाधित हो गया है। अब हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के बाद आयोग को फिर से सक्रिय करने की उम्मीद जगी है।
हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, शीर्ष अधिकारी तलब
मामले की सुनवाई के दौरान झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ, जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस ए.के. राय ने राज्य सरकार से कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा कि सूचना आयोग को आखिर कब तक कार्यशील बनाया जाएगा।
इस दौरान मुख्य सचिव अविनाश कुमार और कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ा। राज्य की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने सरकार का पक्ष रखा।
चार सप्ताह में आयोग को सक्रिय करने का भरोसा
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि अगले चार सप्ताह के भीतर मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति कर आयोग को पूरी तरह कार्यशील बना दिया जाएगा। इस आश्वासन के बाद अदालत ने राज्य सरकार को चार सप्ताह का अंतिम समय दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विकास कुमार ने दलीलें रखीं। हाईकोर्ट के अधिवक्ता धीरज कुमार ने जानकारी दी कि राज्य सरकार ने खंडपीठ को भरोसा दिलाया है कि इस अवधि के भीतर आयोग का कामकाज शुरू हो जाएगा।
अवमानना की चेतावनी पहले ही दे चुका है कोर्ट
पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था कि यदि सूचना आयोग को शीघ्र सक्रिय नहीं किया गया तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने यह भी याद दिलाया था कि 12 दिसंबर 2025 को ही आयोग को क्रियाशील करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ।
एक आरटीआई आवेदन से शुरू हुआ मामला
यह पूरा मामला बिरेंद्र सिंह नामक आवेदक से जुड़ा है, जिन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत जानकारी मांगी थी। 30 दिनों की समय-सीमा बीतने के बावजूद जब उन्हें कोई सूचना नहीं मिली, तो उन्होंने प्रथम अपील दायर की। वहां भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा, जहां अब सूचना आयोग की निष्क्रियता पर सवाल खड़े हुए हैं


