शाहजहांपुर की मिठास में दूध से जन्मे तीन स्वाद, जो बन सकते हैं वैश्विक पहचान
- खुरचन, लौज और रबड़ी ... परंपरा, परिश्रम और नवाचार से जुड़ा शाहजहांपुर का मीठा भविष्य
शाहजहांपुर, वाईबीएन संवाददाता : उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद के कारण शाहजहांपुर जनपद को “मिठास का मक्का” कहा जाता है। यहां विकसित गन्ने की किस्में न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि कई अन्य राज्यों में भी बोई जाती हैं। लेकिन शाहजहांपुर की असली पहचान केवल गन्ने तक सीमित नहीं है। यहां की मिठाइयों में घुली मिठास, स्वाद और परंपरा इसे खास बनाती है। आज बात उन तीन विशिष्ट स्वादों की, जिनका सीधा संबंध दूध से है यानी खुरचन, लौज और रबड़ी।
दूध से उपजी पहचान: तीन मिठाइयां, एक विरासत
शाहजहांपुर की इन तीनों मिठाइयों की जड़ें गांव, कस्बों और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ी हैं। ये केवल मिठाइयां नहीं, बल्कि स्थानीय रोजगार, कुटीर उद्योग और सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं। जबकि गन्ना किस्मों के विकास के कारण शाहजहांपुर को मिठास का मक्का भी कहा जाता है। खास बात यह है कि शाहजहांपुर में जो कोई अधिकारी आता या मेहमान तो तिलहर की लौज, खुदागंज की खुरचन को जरूर ले जाना चाहता। चंदगोई की रबडी का अभी सीमित नाम है। जिसकी अभी उस तरह ब्रांडिग नहीं हो सकती, जैसी कि लौच और खुरचन की है । लेकिन यहां बनी तीनों मिठाइयों लोगों की पहली पसंद रहती है।
खुदागंज की खुरचन: 120 साल पुराना मिठास आज भी बना खास
जनपद का ऐतिहासिक कस्बा खुदागंज खुरचन के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। अमर बलिदानी ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक गांव नवादा दरोबस्त के समीप स्थित खुदागंज में बनने वाली खुरचन विदेश तक ले जाई जाती है। जयपुर, दिल्ली, लखनऊ देहरादून समेत सभी प्रमुख शहरों तक खुदागंज की खुरचन लजीज स्वाद पहचान बना चुकी है, लेकिन अभी तक जियो टैगिंग नही हो सकी। जबकि खुदागंज की खुरचन वैश्विक पहचान की असल हकदार है।
इतिहास : बताया जाता है कि लगभग 120 वर्ष पूर्व छोटे और बड़े नाम के दो भाइयों ने दूध से खुरचन बनाना शुरू किया। विशेष विधि से कढ़ाई में मलाई की परतें जमाकर बनाई जाने वाली यह मिठाई इतनी लोकप्रिय हुई कि मांग लगातार बढ़ती चली गई। आज चौथी पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। वर्तमान में खुरचन का भाव 600 रुपये प्रति किलो है।
युवा व्यापारियों की आसः व्यापारियों का कहना है कि यदि जियो टैगिंग, ब्रांडिंग और बेहतर पैकेजिंग मिले तो यह मिठाई लंबे समय तक सुरक्षित रखकर निर्यात भी की जा सकती है। कारोबारी मनीष गुप्ता मानते हैं कि खुरचन को भौगोलिक पहचान (GI टैग) दिलाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थापित किया जा सकता है।
तिलहर की लौज: ठेले से ब्रांड तक का सफर
तिलहर की पहचान बनी दूध से बनी लौज। इसके जनक थे तिलहर निवासी नंदलाल आर्य, जिन्होंने करीब छह दशक पहले बिरियागंज चौराहे के पास एक छोटे से खोमचे से लौज बेचना शुरू किया।
लजीज स्वाद ने उन्हें प्रसिद्ध कर दिया और यहीं से जन्म हुआ आर्य मिष्ठान भंडार का। आज बरेली, शाहजहांपुर के टाउनहॉल, सदर बाजार और आश्रम बाजार तक उनकी दुकानों की श्रृंखला है। वर्तमान में नई पीढ़ी में रविंद्र आर्य और सत्यप्रकाश आर्य के पुत्र इस व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक ले जा रहे हैं। यह कहानी बताती है कि परंपरा, गुणवत्ता और निरंतरता मिलकर किस तरह एक छोटे व्यवसाय को मजबूत ब्रांड बना सकती है।
लौज से स्वागत यहां की परंपरा : तिलहर और शाहजहांपुर में लोग लौज से अतिथियों का स्वागत करते है। जब कोई यहां वीवीआइपी आता है, तो उन्हें भी उपहार स्वरूप लौज भेंट की जाती है, लेकिन लौज ई मार्केट समेत वैश्विक स्तर पर अभी तक सम्मानजनक स्थान व पहचान न पा सकी।
चंदगोई की रबड़ी : गांव से बाजार तक किफायती, लजीज स्वाद
लगभग पांच दशक पूर्व, रोशनगंज निवासी श्यामनाथ यादव ने चंदगोई में रबड़ी बनाना शुरू किया। आज यह कार्य एक कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है। वर्तमान में यहां आठ लोग बडे पैमाने पर रबडी बनाते हैं। जिनके माघ्यम से 50 लोग सीधे रबड़ी उत्पादन से जुड़े हैं, जबकि करीब 500 लोग भैंस पालन और दूध व्यवसाय से रोजगार पा रहे हैं। गांव में 200 रुपये किलो बिकने वाली रबड़ी, शहर के प्रतिष्ठित मिष्ठान भंडारों में 500 रुपये किलो तक पहुंच जाती है। कारोबारी गंगाराम वर्मा बताते हैं कि कुछ ग्राहक बिना चीनी की प्योर दूध रबड़ी भी मंगवाते हैं, जिसका भाव 300 रुपये प्रति किलो है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन से उचित मूल्य, प्रशिक्षण और बाजार सुविधा मिले तो चंदगोई की रबड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकती है।
नवाचार से संबलः स्वाद से स्वरोजगार तक
खुरचन, लौज और रबड़ी तीनों में अपार संभावनाएं हैं। आवश्यकता है इसके लिए
ब्रांडिंग और पैकेजिंग
जियो टैगिंग / GI टैग
कोल्ड चेन व निर्यात सुविधा
कुटीर उद्योग को सरकारी प्रोत्साहन, की आवश्यकता है।
यदि प्रशासन, उद्योग विभाग और स्थानीय उद्यमियों का सहयोग मिले, तो शाहजहांपुर की यह मिठास केवल स्वाद नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और रोजगार का मॉडल बन सकती है।
सही मायने में शाहजहांपुर की मिठाइयां केवल खाने की चीज नहीं, बल्कि पीढ़ियों की मेहनत, गांवों की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत हैं। सही दिशा में नवाचार और प्रोत्साहन मिले तो यह मिठास देश ही नहीं, दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बना सकती है।








