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यूपी में गाय समस्या तो राजस्थान के लिए समृद्धि, पेश की अनूठी मिशाल

गंगा एक्सप्रेस-वे के लिए खोदी गई मिट्टी से बने निर्जन क्षेत्र में राजस्थान के पांच परिवारों ने दिखाई गौ-पालन की राह, दूध बेचकर कर रहे शानदार भरण-पोषण।

शाहजहांपुर, वाईबीएन संवाददाता : उत्तर प्रदेश में जहां एक ओर गोवंश को अन्ना मवेशी या समस्या के रूप में देखा जा रहा है, वहीं राजस्थान के लोगों के लिए गाय आज भी समृद्धि का पर्याय बनी हुई है। इस बात की बानगी शाहजहांपुर जिले के जलालाबाद विकास खंड में देखने को मिल रही है। यहां राजस्थानी परिवारों ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही प्रबंधन हो, तो गौ-पालन से न केवल परिवार का पेट भरा जा सकता है, बल्कि आर्थिक उन्नति भी की जा सकती है।

जिगनेरा में राजस्थान की गूंज

जलालाबाद विकास खंड के गांव जिगनेरा के पास गंगा एक्सप्रेस-वे के निर्माण के लिए मिट्टी की खुदाई हुई थी। इसके चलते वहां लगभग एक किलोमीटर के दायरे में एक विशाल और गहरा निर्जन क्षेत्र बन गया है। इसी स्थान को राजस्थान से आए पांच परिवारों ने अपना अस्थाई आशियाना बनाया है। ये परिवार अपने साथ लगभग 300 गायों का बड़ा झुंड लेकर यहां प्रवास कर रहे हैं।

श्रम और स्वावलंबन का मंत्र

ये परिवार दिन-रात यहीं खेतों और खाली पड़ी जमीन पर रहकर गायों को चराते हैं। सुबह-शाम दूध दुहकर पास के ही स्थानीय बाजारों और गांवों में आपूर्ति करते हैं। इससे उनकी अच्छी खासी आमदनी हो रही है। जहां स्थानीय किसान आवारा पशुओं से परेशान हैं, वहीं इन परिवारों ने इन्हीं गायों को अपनी ताकत बना लिया है।

प्रशासन को पहल करने की जरूरत

राजस्थान के इन गोपालकों का जीवन यूपी के किसानों के लिए एक सीख है। समाज के प्रबुद्ध जनों का मानना है कि प्रशासन को चाहिए कि वह इन राजस्थानी गोपालकों के अनुभव का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचाए। यदि उनके 'गौ-प्रबंधन' और 'सरोकार के मंत्र' को यहां के लोग अपना लें, तो यूपी में भी गाय समस्या नहीं, बल्कि समृद्धि का आधार बन सकती है। इसके लिए प्रशासन को एक विशेष कार्यक्रम चलाकर संवाद स्थापित करना चाहिए।

गोमती, राधा, सीता नाम सुनते ही आ जाती सभी

300 गाय के कुनबे में कई गायों का नामकरण भी किया गया है। कबीले के मुखिया चंदा ने गोमती आवाज लगाई, आवाज सुनते गाय रंभाती हुई दौडकर आ गई। इसी तरह किसी का नाम राधा, तो किसी का सीता है। आवाज पर आ जाती गाय

ढका के ग्राम प्रधान भी देखने पहुंचे

जितनी गाय-उतनी समृद्धि', तंबू में जिंदगी और कृष्ण सा प्रेम, राजस्थानी कबीले ने दिया खुशहाली का अनोखा मंत्र

जलालाबाद के ढका गांव के पास डेरा जमाए राजस्थानी परिवारों का गजब प्रबंधन, मुखिया चंदा बोले- खेती नहीं, गाय-बकरी ही हमारी जिंदगी, यूपी की बेसहारा गायों को भी कुनबे में कर रहे शामिल।

जलालाबाद: आधुनिकता की चकाचौंध से दूर, जलालाबाद के ढका गांव के पास एक अलग ही दुनिया बसी है। यहां राजस्थान से आए परिवारों का जीवन प्रबंधन और आपसी प्रेम देखकर भगवान श्रीकृष्ण के समय की याद ताजा हो जाती है। सिर पर छत के नाम पर दिन में आसामन रात में तिरपाल का तंबू और रसोई के नाम पर जमीन में गड़ी लोहे की तीन कीलों पर टिका चूल्हा, लेकिन चेहरों पर ऐसी संतुष्टि जो बड़े महलों में भी दुर्लभ है।

सादगी में भगवान कृष्ण का मंत्र यहां रुके राजस्थानी परिवारों ने जीवन को बेहद सहज और सामान्य बना रखा है। अभावों के बीच भी इनके बीच का पारस्परिक प्रेम और सामंजस्य देखते ही बनता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि भगवान कृष्ण का असली मंत्र ... 'सादा जीवन और गो-सेवा' इन्हीं लोगों ने सही मायनों में आत्मसात किया है। न कोई शिकायत, न कोई होड़, बस अपने परिवार और पशुधन के साथ मस्त।

'जितनी गाय, उतना समृद्ध परिवार' कबीले के मुखिया 'चंदा' से जब बात की गई, तो उन्होंने समृद्धि की एक नई परिभाषा बताई। चंदा बताते हैं, "हमारे समाज में जिसके पास जितनी ज्यादा गाय होती हैं, वह उतना ही बड़ा और समृद्ध माना जाता है।" चंदा के पास खुद 20 गायें हैं। उन्होंने बताया कि उनके मूल गांव (राजस्थान) में भी उनके पास ऊंट और बकरियां हैं। उनके लिए खेती बाड़ी मायने नहीं रखती, पशुपालन ही उनकी जिंदगी का असली जरिया है।

यूपी की गायों को भी देते हैं सहारा बातचीत के दौरान एक रोचक और संवेदनशील पहलू भी सामने आया। कबीले के लोगों ने बताया कि राजस्थान की तुलना में यूपी की गाय कद-काठी में छोटी होती हैं और दूध भी कम देती हैं। इसके बावजूद, उनका गो-प्रेम कम नहीं होता। यदि कोई स्थानीय व्यक्ति अपनी गाय को रखना नहीं चाहता या उसे बेसहारा छोड़ना चाहता है, तो ये राजस्थानी परिवार उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं और अपने कुनबे में शामिल कर उसकी सेवा करते हैं।


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