नई भाजपा बनाम पुराने दिग्गज: सत्ता के शिखर पर बदलाव की आहट, भीतर की बेचैनी
छपरा में समृद्धि यात्रा के मंच से राजीव प्रताप रूडी के बयान ने BJP के भीतर चल रहे सत्ता संघर्ष को उजागर कर दिया। नीतीश कुमार की तारीफ और केंद्र पर उठे सवालों से बिहार की राजनीति गरमा गई।

स्टेट ब्यूरो, पटना. बिहार की राजनीति इन दिनों केवल सत्ता के आंकड़ों और चुनावी जोड़-तोड़ तक सीमित नहीं रह गई है। इसके भीतर एक गहरी बेचैनी चल रही है, जो अब सार्वजनिक मंचों से साफ सुनाई देने लगी है। भारतीय जनता पार्टी, जिसने दशकों तक वरिष्ठ नेताओं के अनुभव और सामूहिक नेतृत्व के सहारे अपनी सियासत खड़ी की, अब पूरी तरह नए पावर स्ट्रक्चर की ओर बढ़ चुकी है। इसी बदलाव के बीच पुराने नेताओं की असहजता खुलकर सामने आ रही है और इसका ताजा उदाहरण छपरा में दिखा, जहां समृद्धि यात्रा के मंच से राजीव प्रताप रूडी का दर्द शब्दों में ढल गया।
छपरा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह विकासमय था। करोड़ों की योजनाओं की घोषणाएं, प्रशासन की चुस्त व्यवस्था और राजनीतिक संदेशों से भरा मंच। इसी मंच पर जब सारण से लगातार सांसद चुने जाते रहे राजीव प्रताप रूडी ने बोलना शुरू किया, तो शुरुआत पूरी तरह संतुलित और सकारात्मक रही। उन्होंने बिहार में कनेक्टिविटी के बदलाव का उदाहरण देते हुए कहा कि कभी पटना से गांव पहुंचने में कई घंटे लगते थे, आज वे दिल्ली से चार घंटे से भी कम समय में अमनौर पहुंच जाते हैं। यह बयान सीधे तौर पर नीतीश कुमार के शासन मॉडल की तारीफ था।
लेकिन राजनीति में हर तारीफ के भीतर कोई न कोई संकेत छुपा होता है। कुछ ही देर बाद रूडी की बातों में वह टीस साफ झलकने लगी, जो वर्षों से उनके भीतर दबती चली आ रही थी। उन्होंने कोसी नदी का जिक्र करते हुए कहा कि हर साल सैकड़ों गांव डूब जाते हैं और इसका समाधान केंद्र सरकार के स्तर पर संभव है। नेपाल से बातचीत कर रास्ता निकाला जा सकता है और इसके लिए बिहार के संसाधन ही काफी हैं। यह टिप्पणी महज तकनीकी सुझाव नहीं थी, बल्कि केंद्र की प्राथमिकताओं पर सीधा सवाल थी। खास बात यह रही कि यह सवाल उसी नेता के मुंह से आया, जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में मंत्री रहा है और आज भी भाजपा सांसद है।
राजीव प्रताप रूडी की राजनीतिक यात्रा भाजपा के उस दौर की याद दिलाती है, जब संगठन और सरकार के बीच संतुलन को सबसे बड़ी ताकत माना जाता था। वाजपेयी और आडवाणी के समय अनुभव की अहमियत थी और उसी भरोसे के चलते रूडी जैसे नेताओं को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भी उन्हें थोड़े समय के लिए मंत्री बनाया गया, लेकिन फिर अचानक वे सत्ता के केंद्र से बाहर हो गए। न कोई बड़ा विवाद, न कोई सार्वजनिक चूक, बस एक खामोश दूरी, जो वक्त के साथ और बढ़ती चली गई।
आज की भाजपा में ताकत का केंद्र बदल चुका है। संगठन में औपचारिक पद से ज्यादा महत्व उस पहुंच का है, जो सत्ता और रणनीति के गलियारों तक जाती है। बिहार में यह शक्ति संतुलन उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के इर्द-गिर्द दिखाई देता है। औपचारिक पद भले न हो, लेकिन दिल्ली तक सीधी पकड़ और राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका उन्हें बेहद प्रभावशाली बनाती है। ऐसे में रूडी का दर्द उसी मंच पर निकलना, जहां सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार मौजूद थे, महज संयोग नहीं माना जा सकता।
दिलचस्प यह भी रहा कि रूडी ने जितनी खुलकर नीतीश कुमार की प्रशंसा की, उतनी हाल के दिनों में किसी भाजपा सांसद ने शायद ही की हो। जीविका दीदियों को विकास का आधार बताना और पिछले चुनाव में नीतीश की जीत को उनके काम का नतीजा कहना, यह सब पार्टी लाइन से अलग एक स्वतंत्र राजनीतिक स्वर की तरह लगा। यह वही नीतीश कुमार हैं, जिनकी सोशल इंजीनियरिंग ने वर्षों तक भाजपा और विपक्ष दोनों को चुनौती दी है।
यह पहली बार नहीं है जब रूडी ने अपनी नाराजगी संकेतों में जाहिर की हो। पिछले साल राणा सांगा से जुड़े कार्यक्रम में उनका बयान, जय श्री राम की जगह जय सांगा का आग्रह और राजपूत समाज की राजनीतिक उपेक्षा की बात, पहले ही साफ कर चुकी थी कि वे नए सामाजिक समीकरणों से संतुष्ट नहीं हैं। उनका यह कहना कि हर जाति का नेता है, लेकिन राजपूत समाज का नहीं, भाजपा के बदलते सामाजिक संतुलन पर सीधा सवाल था।
रूडी के बयान के बाद मंच संभालते हुए सम्राट चौधरी ने आश्वासन देने की कोशिश जरूर की। छपरा में एयरपोर्ट, बेहतर सड़क और तेज कनेक्टिविटी के सपने दिखाए गए। लेकिन सियासी जानकार मानते हैं कि यह सिर्फ तात्कालिक डैमेज कंट्रोल था। असली सवाल यह है कि क्या ऐसे आश्वासन उन नेताओं की बेचैनी को खत्म कर पाएंगे, जो खुद को सत्ता के निर्णयों से दूर महसूस कर रहे हैं।
बिहार भाजपा के लिए चुनौती अब सिर्फ विपक्ष नहीं, बल्कि भीतर का संतुलन है। यह टकराव नए नेतृत्व और पुराने अनुभव के बीच का है। राजीव प्रताप रूडी जैसे नेता चुनाव जीत रहे हैं, लेकिन सत्ता की मेज पर उनकी कुर्सी खाली है। छपरा के मंच से निकले उनके शब्द दरअसल एक चेतावनी हैं कि राजनीति केवल आंकड़ों से नहीं, भावनाओं से भी चलती है। और जब भावनाएं लंबे समय तक अनसुनी रहती हैं, तो वे किसी न किसी मंच से गूंज बनकर जरूर बाहर आती हैं।


