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श्रीकृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह विवाद : कोर्ट ने बहस टाली, 20 फरवरी को अगली सुनवाई

हिंदू पक्ष की मांग, मथुरा की संपूर्ण 13.37 एकड़ भूमि, जिसमें श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की संपत्ति है, को मंदिर ट्रस्ट को सौंप दिया जाए और शाही ईदगाह मस्जिद परिसर से कथित अतिक्रमण हटाया जाए।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह विवाद : कोर्ट ने बहस टाली, 20 फरवरी को अगली सुनवाई
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लखनऊ, वाईबीएन संवाददाता। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद मामले में शुक्रवार को प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई, जिसमें हिंदू पक्ष की ओर से दाखिल 18 अलग-अलग वादों पर विचार किया गया। न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने दोपहर दो बजे से इस मामले की सुनवाई की।

हिंदू पक्ष की मुख्य मांग है कि मथुरा की संपूर्ण 13.37 एकड़ भूमि, जिसमें श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की संपत्ति शामिल है, को मंदिर ट्रस्ट को सौंप दिया जाए और शाही ईदगाह मस्जिद परिसर से कथित अतिक्रमण हटाया जाए।

आरोप : शाही ईदगाह कमेटी को दी गई जमीन अवैध

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 1968 में हुए समझौते के तहत शाही ईदगाह कमेटी को दी गई जमीन अवैध है और यह एक कथित समझौता मात्र था, जिसे रद्द कर पूरी भूमि मंदिर ट्रस्ट को वापस मिलनी चाहिए। हिंदू पक्ष ने दावा किया है कि यह स्थान भगवान श्रीकृष्ण का जन्मस्थान है और यहां मस्जिद का निर्माण मंदिर को नष्ट कर किया गया था।

सुनवाई के दौरान मेरिट पर गहन बहस नहीं हो सकी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में कुछ संबंधित मामलों की सुनवाई लंबित है (जिसमें 16 फरवरी को सुनवाई निर्धारित है)। कोर्ट ने सभी पक्षकारों को अपने-अपने जवाब (एफिडेविट या काउंटर) दाखिल करने के निर्देश दिए।

एएसआई ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने वाद संख्या 1 और 3 में अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसे कोर्ट ने अंतिम अवसर के रूप में स्वीकार किया। एएसआई को दो सप्ताह या उचित समय दिया गया है। अन्य पक्षकारों, जिसमें शाही ईदगाह मैनेजमेंट कमेटी शामिल है, को भी जवाब दाखिल करने का आदेश दिया गया।

इसके अलावा, हिंदू पक्ष की ओर से एक संशोधन प्रार्थना पत्र भी दाखिल किया गया, जिसमें 'शाही मस्जिद ईदगाह' शब्द हटाने की मांग की गई है, क्योंकि यह ऐतिहासिक और धार्मिक स्थिति को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करता। कोर्ट ने सभी दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई 20 फरवरी को निर्धारित कर दी है।

यह मामला पिछले पांच वर्षों से विभिन्न अदालतों में चल रहा है। शुरू में मथुरा की निचली अदालत में दाखिल याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर हुईं और कई याचिकाओं को एक साथ जोड़ा गया है ताकि न्याय में तेजी आए। सुप्रीम कोर्ट में भी कुछ याचिकाएं लंबित हैं, जहां हाईकोर्ट के कुछ आदेशों को चुनौती दी गई है।


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