IDBI बैंक शेयरों में गिरावट: क्या निवेशकों का पैसा गया?
IDBI बैंक के विनिवेश पर ब्रेक की खबर से 15% शेयर क्यों टूटा? जानें क्या अब निवेशकों का पैसा डूब जाएगा और सरकार के 80,000 करोड़ के लक्ष्य का क्या होगा?

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । IDBI बैंक के निजीकरण पर ब्रेक की खबरों ने शेयर बाजार में हड़कंप मचा दिया है। सोमवार को बैंक के शेयरों में 15% की भारी गिरावट देखने को मिली। सरकार द्वारा विनिवेश प्रक्रिया रोकने और कम बोलियों की वजह से बोलियां रद्द करने की चर्चा ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
शेयर बाजार में सोमवार का दिन IDBI बैंक के निवेशकों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। जैसे ही यह खबर फैली कि सरकार बैंक की बिक्री (Disinvestment) की प्रक्रिया को फिलहाल रोक सकती है, बिकवाली के दौर ने शेयरों को सीधे 15% नीचे गिरा दिया।
NSE पर शेयर 78.42 रुपये के स्तर पर पहुंच गया, जो इसके 52 हफ्ते के निचले स्तर (71.90 रुपये) के बहुत करीब है। सवाल ये है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि जिस बैंक के निजीकरण की बातें सालों से हो रही थीं, उसकी गाड़ी पटरी से उतर गई?
क्यों रुकी विनिवेश की प्रक्रिया? 'फ्लोर प्राइस' बना विलेन
IDBI बैंक में हिस्सेदारी खरीदने के लिए जिन कंपनियों ने रुचि दिखाई थी, उनके नाम सुनकर आप चौंक सकते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, Fairfax Financial Holdings और Emirates NBD जैसी बड़ी कंपनियों ने वित्तीय बोलियां दी थीं।
हालांकि, पेच वहीं फंसा जिसे बैंकिंग भाषा में 'Floor Price' कहा जाता है। इसे सरल शब्दों में कहें तो:
सरकार ने बैंक की हिस्सेदारी बेचने के लिए एक न्यूनतम कीमत तय की थी।
संभावित खरीदारों ने जो बोलियां लगाईं, वे सरकार की उम्मीद (फ्लोर प्राइस) से काफी कम थीं।
नतीजतन, सरकार ने मौजूदा बोलियों को रद्द करने और प्रक्रिया को फिलहाल रोकने का विचार किया है।
यही खबर थी जिसने निवेशकों के भरोसे को हिलाकर रख दिया। निवेशकों को उम्मीद थी कि निजीकरण के बाद बैंक की वैल्यू बढ़ेगी, लेकिन अब अनिश्चितता के बादल गहरा गए हैं।
2021 से चल रही थी तैयारी, अब सब 'जीरो'?
IDBI बैंक के निजीकरण की कहानी आज की नहीं है। मई 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ने इसके विनिवेश को मंजूरी दी थी। योजना बहुत स्पष्ट थी:
सरकार और LIC मिलकर बैंक में 94% से ज्यादा हिस्सेदारी रखते हैं।
इसमें सरकार की 45.48% और LIC की 49.24% हिस्सेदारी है।
प्रबंधन नियंत्रण को पूरी तरह से प्राइवेट हाथों में सौंपना था।
लेकिन 2023 से 2026 तक यह प्रक्रिया कई उतार-चढ़ाव से गुज़री। कोटक महिंद्रा बैंक जैसे बड़े खिलाड़ियों ने पहले ही हाथ खींच लिया था, जिससे बाजार में हलचल पहले ही शुरू हो गई थी।
सरकार की तिजोरी और 80,000 करोड़ का लक्ष्य
इस गिरावट का असर शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2027 के लिए 80,000 करोड़ रुपये का विनिवेश और एसेट मोनेटाइजेशन का लक्ष्य रखा है।
अगर IDBI बैंक की 30.48% हिस्सेदारी शुक्रवार के क्लोजिंग प्राइस पर बिकती, तो सरकारी खजाने में करीब 30,215 करोड़ रुपये आएंगे। अब अगर यह डील रद्द होती है, तो सरकार के लिए अपने सालाना विनिवेश लक्ष्य को हासिल करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगी। बैंकिंग सेक्टर के लिए यह डील एक 'टेस्ट केस' थी, जिसका फेल होना अन्य सरकारी बैंकों के निजीकरण की राह को भी मुश्किल में डाल सकता है।
निवेशकों के लिए अब क्या है सलाह?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सरकार की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आता, तब तक इस स्टॉक में अस्थिरता बनी रहेगी।
छोटे निवेशक: फिलहाल 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में रहें। पैनिक सेलिंग से बचें, लेकिन भारी निवेश का यह सही समय नहीं है।
लॉन्ग टर्म निवेशक: बैंक की फंडामेंटल्स अभी भी मजबूत हैं, लेकिन निजीकरण की खबर ही इस स्टॉक का मुख्य 'ट्रिगर' थी।
IDBI बैंक की यह गिरावट इस बात का सबूत है कि बाजार सिर्फ वादों पर नहीं, ठोस नतीजों पर चलता है। क्या सरकार बोली प्रक्रिया फिर से शुरू करेगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।


