तेल की कीमतें बढ़ने से भारत को हर महीने कितने हजार करोड़ का होगा नुकसान?
पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध के कारण कच्चे तेल और एलएनजी की कीमतों में तेज उछाल आया है। विशेषज्ञों के अनुसार कीमतें ऊंची रहीं तो भारत को हर महीने 7–8 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने की आशंका है।

वाईबीएन डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया (ईरान-इजराइल-अमेरिका) के बीच छिड़े युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। इसका सबसे गहरा असर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों ने पिछले कुछ दिनों में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखा है। $66 प्रति बैरल पर चल रहा तेल देखते ही देखते $120 तक जा पहुंचा। हालांकि, फिलहाल यह $90 प्रति बैरल के आसपास है। केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि एलएनजी (LNG) की कीमतें भी दोगुनी होकर $24–25 प्रति ब्रिटिश थर्मल यूनिट तक पहुंच गई हैं।
भारत को हर महीने 67,000 करोड़ रुपये का होगा नुकसान
विशेषज्ञों की चेतावनी है कि कीमतें $120 के स्तर पर टिकी रहती हैं तो भारत को अपने तेल बिल के लिए हर महीने 7 से 8 अरब डॉलर (67,000 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त विदेशी मुद्रा खर्च करना होगा। चूंकि भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल और लगभग 50% प्राकृतिक गैस आयात करता है, इसलिए यह उछाल सीधे तौर पर देश के खजाने पर बोझ डाल रहा है।
कच्चे तेल की इस बढ़ती कीमत का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले रहा है।
बढ़ता व्यापार घाटा : कच्चे तेल में हर $10 की बढ़ोतरी भारत के चालू खाता घाटा (CAD) को जीडीपी के 1.9% से बढ़ाकर 2.2% तक ले जा सकती है।
महंगाई का दबाव : विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की कीमतों में 10% की वृद्धि थोक महंगाई दर (WPI) को 0.8% से 1% तक बढ़ा देती है। इससे लॉजिस्टिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और खाने-पीने की चीजों की लागत बढ़ना तय है।
रुपये और निवेश पर असर : डॉलर की बढ़ती मांग से रुपया कमजोर हो सकता है, जिससे आयात और भी महंगा हो जाएगा। साथ ही अनिश्चितता के माहौल में विदेशी निवेशक बाजार से हाथ खींच सकते हैं।
कॉर्पोरेट जगत और शेयर बाजार में हड़कंप
तेल की कीमतों ने शेयर बाजार में भी रक्तपात मचाया है। सोमवार यानी 9 मार्च 2026 को तेल मार्केटिंग और पेंट कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई। BPCL में 6% से ज्यादा, जबकि HPCL और IOC में 4-5% की गिरावट रही। पेंट उद्योग (एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स, इंडिगो पेंट्स आदि) पर भी दबाव दिखा, क्योंकि तेल इनके लिए कच्चे माल का मुख्य स्रोत है।
वैश्विक रुख और भविष्य की राह
फिलहाल G-7 देशों ने अपने रणनीतिक तेल भंडार खोलने से मना कर दिया है, जिससे बाजार में तत्काल राहत की उम्मीद कम है। सारा दारोमदार अब होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर है। यदि युद्ध के कारण यहाँ से आपूर्ति बाधित हुई तो कीमतें मौजूदा स्तर से भी काफी ऊपर जा सकती हैं।


