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राम रहीम को बड़ी राहत: छत्रपति हत्याकांड में हाईकोर्ट ने क्यों किया बरी?

छत्रपति हत्याकांड में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने राम रहीम को राहत देते हुए क्या बरी कर दिया है? क्या सबूतों की कमी का मिला लाभ, कोर्ट ने उम्रकैद की सजा रद्द की?

राम रहीम को बड़ी राहत: छत्रपति हत्याकांड में हाईकोर्ट ने क्यों किया बरी?
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नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में सबूतों की कमी के चलते बरी कर दिया है। सीबीआई कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को overturn करते हुए, कोर्ट ने इसे 'संदेह का लाभ' करार दिया है। आइए, इस महत्वपूर्ण फैसले के पीछे की कानूनी वजहें और राम रहीम के भविष्य पर इसके असर पर नज़र डालते हैं।

करीब दो दशक पुराना यह सनसनीखेज मामला आज एक नया मोड़ ले आया है, जिसने हरियाणा की राजनीति और न्याय व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मामले में सलाखों के पीछे दिन बिता रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को हाईकोर्ट से सफाई मिल गई है।

लेकिन सवाल ये है कि जिस मामले में निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी, वहां हाईकोर्ट को सबूत कम क्यों लगे? चलिए, इस कानूनी लड़ाई की गहराई में जाते हैं।

निचली अदालत का फैसला और हाईकोर्ट की दलील

2019 में पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत ने राम रहीम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस समय माना गया कि हत्या की साजिश सीधे डेरा प्रमुख से जुड़ी है। हालाँकि, राम रहीम ने इस फैसले को चुनौती दी।

हाईकोर्ट में लंबी बहस के बाद जजों की बेंच ने देखा कि सीबीआई द्वारा पेश किए गए सबूतों में कुछ ऐसी कड़ियाँ थीं, जो 'संदेह से परे' साबित नहीं हो सकीं। कोर्ट ने साफ किया कि जब तक आरोप पूरी तरह से ठोस न हों, किसी को दोषी ठहराना न्यायपूर्ण नहीं है। यही 'बेनेफिट ऑफ डाउट' राम रहीम की सजा को खत्म कर गया।

दिलचस्प बात: राम रहीम के बरी होने के बावजूद, मामले के अन्य तीन आरोपियों—कुलदीप, निर्मल, और किशन लाल—की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया है। मतलब, हत्या हुई, हथियार चले, लेकिन अभियोजन पक्ष राम रहीम के सीधे आदेश को साबित नहीं कर पाया।

क्या अब जेल से बाहर आएंगे राम रहीम?

हालांकि छत्रपति हत्याकांड में उन्हें राहत मिली है, लेकिन डेरा समर्थकों के लिए 'जश्न' मनाना अभी जल्दी होगा। राम रहीम अभी जेल से बाहर नहीं आ पाएंगे। इसकी दो प्रमुख वजहें हैं:

दुष्कर्म का मामला: राम रहीम दो साध्वियों के साथ यौन शोषण के मामले में 20 साल की सजा काट रहे हैं।

रणजीत सिंह हत्याकांड: इस मामले में भी उन्हें पहले राहत मिल चुकी है, लेकिन कानूनी प्रक्रियाएं और दुष्कर्म की सजा उन्हें अभी रोहतक की सुनारिया जेल में ही रखेगी।

रामचंद्र छत्रपति: वो निडर पत्रकार जिसने 'सच' की कीमत चुकाई

यह कहानी सिर्फ राम रहीम की नहीं, बल्कि उस निडर पत्रकार की भी है जिसने सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति ने अपने अखबार 'पूरा सच' में डेरे के भीतर हो रहे शोषण की खबरें प्रमुखता से छापी थीं।

अक्टूबर 2002 में उन पर जानलेवा हमला हुआ, और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। उनके बेटे अंशुल छत्रपति ने वर्षों तक इस कानूनी लड़ाई को लड़ा। आज का फैसला अंशुल और उनके परिवार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

कानूनी पेच: 'संदेह का लाभ' क्या होता है?

कई बार लोग पूछते हैं कि जब निचली अदालत सजा सुनाती है, तो ऊपरी अदालत बरी कैसे कर सकती है? भारतीय कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है— "सौ गुनहगार छूट जाएं, पर एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए।"

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के विश्लेषण में पाया कि राम रहीम के खिलाफ पेश की गई गवाहियां और परिस्थितिजन्य साक्ष्य में विरोधाभास था। जब सबूतों की चेन टूट जाती है, तो अदालत आरोपी को संदेह का लाभ देकर बरी कर देती है।

फैसले के मायने और आगे क्या?

इस फैसले के बाद अब सबकी नजरें सीबीआई पर हैं। क्या सीबीआई इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी? कानून के जानकारों का मानना है कि यह मामला बेहद हाई-प्रोफाइल है, इसलिए इसे शीर्ष अदालत तक ले जाना लगभग तय है।

मुख्य बिंदु एक नजर में:

तारीख: 2002 में हत्या, 2019 में सजा, 2024 (वर्तमान संदर्भ) में बरी।

राहत: राम रहीम को हत्या की साजिश के आरोपों से मुक्ति।

अन्य दोषी: कुलदीप, निर्मल और किशन लाल को कोई राहत नहीं।

वर्तमान स्थिति: राम रहीम सुनारिया जेल में बंद रहेंगे।

इस फैसले ने एक बार फिर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं कि क्या बड़े मामलों में जांच की कमी का फायदा रसूखदार लोग उठा लेते हैं? या फिर सच में राम रहीम को गलत तरीके से फंसाया गया था? इन सवालों के जवाब भविष्य की कानूनी लड़ाइयों में छिपे हुए हैं।


Ajit Kumar Pandey

Ajit Kumar Pandey

पत्रकारिता की शुरुआत साल 1994 में हिंदुस्तान अख़बार से करने वाले अजीत कुमार पाण्डेय का मीडिया सफर तीन दशकों से भी लंबा रहा है। उन्होंने दैनिक जागरण, अमर उजाला, आज तक, ईटीवी, नवभारत टाइम्स, दैनिक हिंट और दैनिक जनवाणी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में फील्ड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक अपनी सेवाएं दीं हैं। समाचार लेखन, विश्लेषण और ग्राउंड रिपोर्टिंग में निपुणता के साथ-साथ उन्होंने समय के साथ डिजिटल और सोशल मीडिया को भी बख़ूबी अपनाया। न्यू मीडिया की तकनीकों को नजदीक से समझते हुए उन्होंने खुद को डिजिटल पत्रकारिता की मुख्यधारा में स्थापित किया। करीब 31 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ अजीत कुमार पाण्डेय आज भी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और जनहित, राष्ट्रहित और समाज की सच्ची आवाज़ बनने के मिशन पर अग्रसर हैं।

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