आखिर क्यों अमेरिकी लड़ाकू विमानों को 'No' कहता रहा है भारत?
जंग में हथियार और लड़ाकू विमानों की अहम भूमिका होती है। पश्चिम एशिया में अमेरिकी लड़ाकू विमान ईरान पर भारी पड़ रहे। आप जानकर हैरान होंगे कि सारे खतरनाक जेट भारत को ऑफर किए गए थे, लेकिन हमारी सरकारों ने लिया नहीं। क्या वह गलती थी या सोची-समझी रणनीति?

वाईबीएन डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर कहा जाता है कि युद्ध केवल सरहदों पर गोलियों से नहीं, बल्कि पीछे बैठी सप्लाई चेन और कूटनीति की बिसात पर जीते जाते हैं। भारत के बॉर्डर पर बनती पक्की सड़कें और हाईवे पर लड़ाकू विमानों की लैंडिंग की रिहर्सल इसी लंबी तैयारी का हिस्सा है। लेकिन इस तैयारी के बीच एक दिलचस्प सवाल हमेशा तैरता रहता है। दुनिया के सबसे घातक अमेरिकी लड़ाकू विमान, जो आज ईरान के पसीने छुड़ा रहे हैं, वे भारत के बेड़े में क्यों नहीं हैं? जबकि अमेरिका ने पिछले दो दशकों में अपने लगभग हर सुपर फाइटर का ऑफर भारत की मेज पर रखा है।
ईरान में अमेरिकी फाइटर्स का शक्ति प्रदर्शन
पश्चिम एशिया की आग में इस वक्त अमेरिका की पूरी 'लड़ाकू शक्ति' झोंक दी गई है। F/A-18 सुपर हॉर्नेट विमानवाहक पोतों से दहाड़ रहे हैं, F-15E स्ट्राइक ईगल्स और F-16 खाड़ी के बेस से उड़ान भर रहे हैं। वहीं, रडार की पकड़ में न आने वाले F-22 रैप्टर और F-35 जैसे स्टील्थ विमान इजरायल के साथ मिलकर टारगेट तबाह कर रहे हैं। रात के अंधेरे में तबाही मचाने वाले B-2 बमवर्षक नॉन-स्टॉप मिशन पर हैं। ईरान के पास इन विमानों का कोई ठोस तोड़ नहीं है और यही वजह है कि तेहरान की चिंता बढ़ी हुई है। ये वही विमान हैं, जिन्हें अमेरिका वर्षों से भारत को बेचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भारत का जवाब हमेशा एक ही रहा-धन्यवाद, पर हमें इसकी जरूरत नहीं।
अविश्वास की जड़ें : इतिहास का कड़वा सबक
भारत का अमेरिका पर भरोसा न करने के पीछे एक गहरा ऐतिहासिक जख्म है। शीत युद्ध के दौरान जब भारत अपनी संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहा था, तब अमेरिका खुलेआम पाकिस्तान के पाले में खड़ा था। अमेरिका ने जानते-बूझते पाकिस्तान को F-86, F-104 स्टारफाइटर और बाद में F-16 फाइटिंग फाल्कन जैसे घातक विमान दिए। 1965 और 1971 की जंग में पाकिस्तान ने इन्हीं अमेरिकी हथियारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया। भारत को यह समझ आ गया था कि संकट के समय अमेरिका कभी भी सप्लाई की नली बंद कर सकता है। यही कारण था कि भारत ने रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) की ओर रुख किया और मिग-21, मिग-29 और सुखोई-30MKI को अपनी वायुसेना की रीढ़ बनाया। फ्रांस के मिराज-2000 और ब्रिटेन के जगुआर को तवज्जो दी, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता न रहे।
1998 का परमाणु परीक्षण और 'अंकल सैम' की धौंस
रिश्तों में अविश्वास की सबसे मोटी परत तब जमी, जब 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद क्लिंटन प्रशासन ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए। रातों-रात टेक्नोलॉजी और स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई रोक दी गई। अमेरिका का संदेश साफ था- अगर आप हमारी शर्तों पर नहीं चलेंगे तो आपको इसकी कीमत चुकानी होगी। भारत ने वह कीमत चुकाई, लेकिन अपनी रक्षा स्वायत्तता का सौदा नहीं किया। यही वह दौर था जिसने भारतीय नीति निर्माताओं के मन में यह बात बैठा दी कि अमेरिकी फाइटर जेट्स लेना यानी अपनी चाबी अमेरिका के हाथ में सौंपना है।
सब कुछ खरीदेंगे, पर फाइटर जेट नहीं!
हैरानी की बात यह है कि भारत अमेरिका से अरबों डॉलर के हथियार खरीद रहा है। हमारे पास C-17 ग्लोबमास्टर, P-8I पोसीडॉन, अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर, और अब MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन भी हैं। फिर फाइटर जेट्स से परहेज क्यों?
इसका जवाब है 'संप्रभुता'। फाइटर जेट केवल एक प्लेन नहीं, एक पूरा इकोसिस्टम होता है। अमेरिकी जेट लेने का मतलब है-
सॉफ्टवेयर लॉक : अमेरिका अपने विमानों के कोड साझा नहीं करता। वह जब चाहे रिमोटली आपके विमान को बेकार कर सकता है।
स्पेयर पार्ट्स की ब्लैकमेलिंग : तुर्की और पाकिस्तान इसका उदाहरण हैं। जरा भी अनबन हुई तो स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई रोक दी जाती है।
राजनीतिक शर्तें : अमेरिका अक्सर एंड-यूजर मॉनिटरिंग की शर्तें थोपता है यानी आप विमान का इस्तेमाल कहां और कैसे करेंगे, इस पर उसकी नजर रहेगी।
मिग-21 से भी अमेरिका के F-16 को मार गिरा सकता है भारत
भारत ने 2019 में बालाकोट स्ट्राइक के दौरान यह साबित कर दिया कि वह अपने पुराने सोवियत युग के मिग-21 से भी अमेरिका के F-16 को मार गिरा सकता है। जब अमेरिका ने पाकिस्तान के पुराने F-16 को F-21 का नया नाम देकर भारत को बेचने की कोशिश की तो भारत ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। वहीं, नौसेना के लिए भी हमने अमेरिकी सुपर हॉर्नेट के बजाय फ्रांस के राफेल को चुना, क्योंकि फ्रांस बिना किसी शर्त और बिना किसी धौंस के तकनीक साझा करता है।
आत्मनिर्भरता ही असली सुरक्षा
आज अमेरिका भले ही भारत को अपना सबसे आधुनिक F-35 ऑफर करने का लालच दे, लेकिन भारत का रुख स्पष्ट है। भारत अब अपने स्वदेशी LCA तेजस और भविष्य के Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) पर दांव लगा रहा है। भारत जानता है कि आसमान की सुरक्षा तब तक अधूरी है, जब तक विमान के सॉफ्टवेयर का रिमोट कंट्रोल किसी दूसरे देश की राजधानी में बैठा हो। अमेरिका से दोस्ती अपनी जगह है, लेकिन युद्ध की स्थिति में सप्लाई के लिए किसी के रहमोकरम पर रहना भारत की फितरत में नहीं है।


