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चैत्र नवरात्रि: अनूठी मान्यता,मां हिंगुला के दिव्य चमत्कार से जलती है जगन्नाथ मंदिर की 'अक्षय' रसोई

मां हिंगुला के चमत्कार से जुड़ी मान्यता के अनुसार जगन्नाथ मंदिर की रसोई आज भी दिव्य अग्नि से संचालित मानी जाती है। कहा जाता है कि यह पवित्र अग्नि कभी बुझती नहीं और देवी की कृपा का प्रतीक है।

Priti Jha
चैत्र नवरात्रि: अनूठी मान्यता,मां हिंगुला के दिव्य चमत्कार से जलती है जगन्नाथ मंदिर की अक्षय रसोई
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नई दिल्ली। मां हिंगुला के चमत्कार से जुड़ी मान्यता के अनुसार जगन्नाथ मंदिर की रसोई आज भी दिव्य अग्नि से संचालित मानी जाती है। कहा जाता है कि यह पवित्र अग्नि कभी बुझती नहीं और देवी की कृपा का प्रतीक है। चैत्र माह में मां हिंगुला की विशेष यात्रा निकाली जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। यह परंपरा आस्था, चमत्कार और धार्मिक विश्वास का अद्भुत संगम मानी जाती है।

19 मार्च में नौ अलग-अलग रूपों में भक्तों को दर्शन देने के लिए आ रही हैं और देशभर के देवी मंदिरों में मां के स्वागत के लिए तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं। ओडिशा में मां भगवती के कई रूपों की पूजा होती है लेकिन चैत्र नवरात्रि के आगमन के साथ मां भगवती को अग्नि के रूप में पूजा जाता है और इसका संबंध विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा है। हम बात कर रहे हैं मां हिंगुला मंदिर की, जो सिद्धपीठों में शामिल है।

ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्थित मां हिंगुला मंदिर राज्य के बाकी मंदिरों से भव्य और मन को मोह लेने वाला है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में मां की सोने से सजी प्रतिमा विराजमान है, जहां मां के चारों हाथों में अस्त्र और शस्त्र मौजूद हैं। नवरात्रि के नौ दिन मां के दिव्य शृंगार किए जाते हैं। खास बात यह है कि मां हिंगुला को अग्नि की देवी के रूप में पूजा जाता है। भक्त चैत्र नवरात्रि में मां के दर्शन करने के बाद भोग मंदिर में बने अग्निकुंड में डालते हैं।

स्थानीय कथाओं की मानें तो मां हिंगुला का संबंध विश्व प्रसिद्ध पुरी के जगन्नाथ मंदिर से भी है। माना जाता है कि पुरी के राजा को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में आदेश दिया था कि वे मां हिंगुला की पूजा करें ताकि जगन्नाथ मंदिर की अनूठी रसोई में प्रतिदिन आने वाले विशाल प्रसाद का प्रबंधन हो सके। ऐसा माना जाता है कि देवी पुरी की रसोई में पवित्र अग्नि के रूप में प्रकट होती हैं और यही कारण है कि चैत्र के महीने में मां हिंगुला के मंदिर में 'हिंगुला यात्रा' निकाली जाती है। यह यात्रा न सिर्फ आध्यात्मिकता का प्रतीक है, बल्कि इस लोक उत्सव में ओडिशा की संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है।

चैत्र नवरात्रि में मां हिंगुला को समर्पित मेला भी लगता है, जिसमें भक्त नौ दिन तक भारी संख्या में मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। भक्तों को मानना है कि मां हिंगुला के अग्नि रूप में दर्शन करने के बाद जिंदगी के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि भक्त खास कर नवजात बच्चों को मां हिंगुला के दर्शन के लिए लेकर आते हैं और कुछ वहां पर मुंडन भी कराते हैं।


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