आर्थिक समीक्षा में क्यों खतरनाक मानी है देश में मोटापे की बढ़ती समस्या, जाने कौन से हैं उपाय?
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि अस्वास्थ्यकर आहार, जीवनशैली में बदलाव, जिसमें आरामतलब जीवनशैली, अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (यूपीएफ) का बढ़ता सेवन और पर्यावरणीय कारक शामिल हैं।

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि मोटापा खतरनाक दर से बढ़ रहा है और आज भारत में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गया है। समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया है कि लोगों को अपने आहार में सही पोषक तत्वों का सेवन करने पर ध्यान देना चाहिए और आहार संबंधी सुधारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में लेना चाहिए। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि अस्वास्थ्यकर आहार, जीवनशैली में बदलाव, जिसमें आरामतलब जीवनशैली, अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (यूपीएफ) का बढ़ता सेवन और पर्यावरणीय कारक शामिल हैं, के कारण मोटापा सभी आयु वर्ग के लोगों को प्रभावित कर रहा है।
24 प्रतिशत भारतीय महिलाएं मोटापे से ग्रस्त
समीक्षा में कहा गया कि ऐसी जीवनशैली से मधुमेह, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों (एनसीडी) का जोखिम बढ़ रहा है, जिससे शहरी और ग्रामीण दोनों आबादी प्रभावित हो रही हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2019-21 की रिपोर्ट के अनुसार, 24 प्रतिशत भारतीय महिलाएं और 23 प्रतिशत भारतीय पुरुष अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 15-49 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं में 6.4 प्रतिशत और पुरुषों में चार प्रतिशत मोटापे से ग्रस्त हैं।
पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बढ़ी मोटापे की समस्या
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में अधिक वजन के मामले 2015-16 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2019-21 में 3.4 प्रतिशत हो गए हैं। आर्थिक समीक्षा में चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया है कि अनुमानों के अनुसार, 2020 में भारत में 3.3 करोड़ से अधिक बच्चे मोटापे से ग्रस्त थे, और इस संख्या के 2035 तक 8.3 करोड़ तक पहुंचने की आशंका है। सर्वेक्षण के अनुसार, भारत यूपीएफ की बिक्री के लिए सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है, जिसमें 2009 से 2023 तक 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।
भारत में यूपीएफ की खुदरा बिक्री बढ़ी
भारत में यूपीएफ की खुदरा बिक्री 2006 में 0.9 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2019 में लगभग 38 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई, जो 40 गुना वृद्धि है। सर्वेक्षण में कहा गया है, “इसी अवधि के दौरान पुरुषों और महिलाओं दोनों में मोटापा लगभग दोगुना हो गया है। यह आहार में बदलाव के समानांतर ही मोटापे में वैश्विक वृद्धि को दर्शाता है।” आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि यूपीएफ लंबे समय से चले आ रहे आहार के तौर-तरीकों को विस्थापित कर रहे हैं, आहार की गुणवत्ता को खराब कर रहे हैं और कई पुरानी बीमारियों के बढ़ते जोखिम से जुड़े हैं।
कैसे निपटें मोटापे की समस्या से
सर्वेक्षण में सुबह से लेकर देर रात तक उनके विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करने का आह्वान किया गया है। इसमें कहा गया है कि शोधकर्ताओं की एक वैश्विक टीम ने यूपीएफ और मानव स्वास्थ्य पर ‘लैंसेट सीरीज’ पर काम किया, जिसमें वैश्विक साक्ष्यों को समेकित किया गया है जो यह दर्शाता है कि यूपीएफ का अधिक सेवन कई प्रतिकूल स्वास्थ्य परिणामों, जैसे मोटापा, पुराने हृदय रोग के जोखिम, श्वसन संबंधी समस्याएं, मधुमेह, मानसिक स्वास्थ्य विकार आदि, से जुड़ा है। सर्वेक्षण में शिशु और छोटे बच्चों के दूध और पेय पदार्थों के विपणन पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग की गई है।


