क्या जंग की भी कोई मर्यादा है? जानिए जिनेवा कन्वेंशन की वो चार संधियां, जो सिखाती हैं युद्ध का 'धर्म'
हम ऐसे समय में हैं, जब कई देशों में बारूद का धुआं है। तोपें आग उगल रहीं। देश एक-दूसरे को मिटाने पर तुले हैं। क्या ऐसे खौफनाक मंजर के बीच भी इंसानियत की कोई जगह हो सकती है?

वाईबीएन डेस्क, नई दिल्ली। युद्ध की विभीषिका मनुष्य के इतिहास जितनी ही पुरानी है। रक्तपात और विनाश के तांडव के बीच क्या इंसानियत के लिए कोई जगह बचती है? मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने शायद इसी कशमकश में लिखा था-खून अपना हो या पराया हो, नस्ल-ए-आदम का खून है आखिर। जंग मशरिक में हो कि मगरिब में, अम्न-ए-आलम का खून है आखिर। साहिर के इन्हीं मानवीय सवालों का कानूनी और वैश्विक जवाब है-जिनेवा कन्वेंशन। यह महज कागजों का पुलिंदा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संधियों की वह मर्यादा रेखा है, जो बताती है कि जब तोपें आग उगल रही हों, तब भी किन नियमों को तोड़ना युद्ध अपराध माना जाएगा।
इंसानियत का घोषणापत्र : 1864 से अब तक का सफर
जिनेवा कन्वेंशन की नींव 19वीं सदी के मध्य में एक मर्मस्पर्शी घटना से पड़ी थी। रेड क्रॉस के संस्थापक हेनरी ड्यूनेंट ने 1859 में सॉल्फेरिनो के युद्ध में घायल सैनिकों की तड़प को देखा और पसीज गए। उनकी पहल पर 1864 में पहली संधि हुई। आज हम जिस आधुनिक स्वरूप को देखते हैं, वह 1949 में द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहता के बाद तैयार हुआ। इसमें चार मुख्य संधियां और तीन अतिरिक्त प्रोटोकॉल शामिल हैं। दुनिया के 194 से अधिक देश इसके हस्ताक्षरकर्ता हैं, जो इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का सबसे स्वीकृत हिस्सा बनाता है।
मर्यादा के चार स्तंभ : कौन देता है किसे सुरक्षा?
जिनेवा कन्वेंशन की संरचना चार प्रमुख स्तंभों पर टिकी है, जो युद्ध के अलग-अलग पीड़ितों को कवच प्रदान करते हैं-
घायल सैनिक (थल सेना) : पहली संधि के अनुसार युद्ध के मैदान में घायल या बीमार सैनिक को चिकित्सा सहायता देना अनिवार्य है, चाहे वह मित्र देश का हो या शत्रु का। अस्पताल और एम्बुलेंस पर हमला करना वर्जित है।
समुद्री योद्धा : दूसरी संधि नौसैनिकों और उन नाविकों की रक्षा करती है जिनका जहाज डूब गया हो। इसमें हॉस्पिटल शिप्स को विशेष सुरक्षा प्राप्त है।
युद्धबंदी (POWs) : तीसरी संधि सबसे चर्चित है। यह कहती है कि युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार हो। उनसे केवल नाम, रैंक और नंबर पूछा जा सकता है। जानकारी निकलवाने के लिए प्रताड़ना देना अंतरराष्ट्रीय अपराध है।
आम नागरिक : चौथी संधि स्पष्ट करती है कि नागरिक टारगेट नहीं हो सकते। कब्जा किए गए क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सामूहिक सजा या जबरन निर्वासन देना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
युद्ध के नो-गो जोन : कहां हमला करना है मना?
यह कानून सैन्य और नागरिक ठिकानों के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींचता है। जंग के दौरान केवल सैन्य लक्ष्यों (हथियार डिपो, चौकियां) पर हमला हो सकता है। निम्नलिखित स्थानों को निशाना बनाना युद्ध अपराध है।
- नागरिक अस्पताल और स्कूल।
- धार्मिक स्थल और सांस्कृतिक धरोहरें।
- परमाणु बिजली घर और बड़े बांध (जिनके टूटने से सामूहिक विनाश हो सके)।
- रेड क्रॉस या रेड क्रीसेंट का निशान वाली इमारतें।
गृहयुद्ध में भी लागू होती है मर्यादा
अक्सर माना जाता है कि नियम केवल दो देशों के बीच लागू होते हैं, लेकिन इसका कॉमन आर्टिकल 3 इसे आंतरिक संघर्षों पर भी लागू करता है। यह बंधक बनाने और बिना निष्पक्ष मुकदमे के सजा देने को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है।
उल्लंघन पर दंड : कानून के लंबे हाथ
जिनेवा कन्वेंशन के गंभीर उल्लंघन को ग्रेव ब्रीचेज कहा जाता है। इसके लिए यूनिवर्सल ज्यूरिस्डिक्शन का सिद्धांत काम करता है। इसका मतलब है कि यदि किसी ने युद्ध अपराध किया है तो दुनिया का कोई भी देश उसे गिरफ्तार कर मुकदमा चला सकता है। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) जैसी संस्थाएं सुनिश्चित करती हैं कि वर्दी की आड़ में मानवता का गला घोंटने वाले सजा से न बच सकें।
भविष्य की चुनौतियां : ड्रोन और साइबर वॉर
आज के दौर में जब हमले हजारों मील दूर बैठे ऑपरेटर ड्रोन से करते हैं, तो जिम्मेदारी तय करना कठिन हो गया है। इसके बावजूद, जिनेवा कन्वेंशन का मूल मंत्र-युद्ध की भी एक मर्यादा होती है'-आज भी उतना ही अटल है।
जिनेवा कन्वेंशन नैतिक धागा
जैसा कि साहिर ने कहा था कि जंग तो खुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी। जिनेवा कन्वेंशन वह नैतिक धागा है, जो युद्ध की अराजकता के बीच भी इंसानियत को बचाए रखता है। अगर ये नियम न होते तो दुनिया अब तक अपनी पाश्विकता की भेंट चढ़ चुकी होती।


