ईरान-इजरायल युद्ध: क्या ये 10 चेहरे रोक सकते हैं विनाश की दस्तक?
ओमान के सुल्तान, कतर के अमीर यह युद्ध रोक सकते हैं। मगर, ट्रंप के करीबी विटकॉफ, मस्क, कुशनर अमेरिकी पक्ष से बंधे हैं। जबकि ईरानी पक्ष लारीजानी कठोर है। कुल मिलाकर पूर्ण युद्ध रोकना मुश्किल लगता है। वैसे, मध्यस्थता से बात की जा सकती है।

वाईबीएन डेस्क, नई दिल्ली। मध्य-पूर्व का आसमान आज मिसाइलों की रोशनी और मलबे के धुएं से अटा पड़ा है। इजरायल और अमेरिका के भीषण हमलों के बाद ईरान के नेतृत्व में हुआ बड़ा बदलाव सुप्रीम लीडर के रूप में मोजतबा खामेनेई का उदय पूरे क्षेत्र को एक ऐसे चौराहे पर ले आया है जहाँ से एक तरफ पूर्ण युद्ध है और दूसरी तरफ कूटनीति की आखिरी उम्मीद। सवाल यह है कि क्या दुनिया में ऐसे कोई 10 व्यक्ति हैं, जो डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामकता और मोजतबा खामेनेई के प्रतिशोध के बीच ढाल बन सकें?
1. कूटनीति के साइलेंट खिलाड़ी: सुल्तान हैथम बिन तारिक (ओमान)
ओमान को दशकों से मिडल-ईस्ट का स्विट्जरलैंड कहा जाता है। सुल्तान हैथम की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे मस्कट के उन कमरों में बैठते हैं, जहां अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बिना दुनिया को बताए बात करते हैं। मोजतबा खामेनेई को उनका बधाई संदेश केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सेतु है। सुल्तान की पहुंच ट्रंप के मार-ए-लागो से लेकर तेहरान के सुरक्षा मुख्यालय तक है। वे इस समय युद्ध रोकने वाले सबसे प्रभावी मध्यस्थ साबित हो सकते हैं।
2. नैतिक आवाज: पोप लियो XIV
कैथोलिक चर्च के प्रमुख के रूप में पोप की भूमिका केवल धार्मिक नहीं, बल्कि नैतिक दबाव की है। हालांकि खामेनेई पर उनका सीधा राजनीतिक प्रभाव नहीं है, लेकिन वे डोनाल्ड ट्रंप के ईसाई मतदाता आधार के जरिए उन पर शांति के मसीहा बनने का दबाव बना सकते हैं। उनकी अपील अंतरराष्ट्रीय जनमत को युद्ध के खिलाफ खड़ा करने में सहायक हो सकती है।
3. शिया जगत का केंद्र: अयातुल्ला अली अल-सिस्तानी
इराक के नजफ में बैठे सिस्तानी साहब दुनिया के सबसे प्रभावशाली शिया धर्मगुरु हैं। ईरान के नए नेतृत्व (मोजतबा) के लिए सिस्तानी का समर्थन या विरोध उनकी धार्मिक वैधता तय करता है। सिस्तानी ट्रंप से बात नहीं करेंगे, लेकिन वे ईरान को यह समझाने में सक्षम हैं कि एक लंबा युद्ध शिया समुदाय और इराक के अस्तित्व को संकट में डाल देगा। वे ईरान की आक्रामकता को नियंत्रित करने का सबसे मजबूत आंतरिक वाल्व हैं।
4. रणनीतिक संतुलन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
भारत की स्थिति इस युद्ध में सबसे दिलचस्प है। पीएम मोदी ने इजरायल के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को नया आयाम दिया है, लेकिन ईरान के चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा हितों को वे नजरअंदाज नहीं कर सकते। ट्रंप के साथ मोदी की व्यक्तिगत केमिस्ट्री जगजाहिर है। यदि ट्रंप को डील-मेकर की अपनी छवि बचानी है तो मोदी उन्हें यह समझा सकते हैं कि युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत जैसे देशों के विकास को दशकों पीछे धकेल देगा।
5. ट्रंप के रणनीतिकार: जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ
अब्राहम एकॉर्ड्स के वास्तुकार जेरेड कुशनर और ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ वर्तमान में अमेरिका की ईरान नीति के दिमाग हैं। इनकी सीधी पहुंच ट्रंप तक है। कुशनर का दृष्टिकोण यह रहा है कि आर्थिक समृद्धि के जरिए शांति लाई जाए। यदि ये दोनों ट्रंप को राजी कर सकें कि ईरान पर अधिकतम दबाव का अंत एक समझौते से होना चाहिए न कि विनाशकारी युद्ध से तो युद्ध टल सकता है।
6. अरब जगत की ताकत : शेख मोहम्मद बिन जायद (MBZ)
यूएई के राष्ट्रपति MBZ ने ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है, लेकिन वे जानते हैं कि एक जलता हुआ ईरान उनके अपने व्यापारिक साम्राज्य (दुबई-अबू धाबी) के लिए खतरा है। MBZ ट्रंप के करीबी सहयोगी हैं और वे अमेरिका को लक्षित हमलों और पूर्ण युद्ध के बीच का फर्क समझा सकते हैं।
7. टेक-डिप्लोमेसी के नए दूत : एलन मस्क
एलन मस्क की भूमिका अब केवल बिजनेस तक सीमित नहीं है। स्टारलिंक के जरिए ईरान के भीतर पहुंच और ट्रंप के सलाहकार के रूप में उनकी सक्रियता ने उन्हें एक 'अनौपचारिक राजनयिक' बना दिया है। मस्क युद्ध के बजाय तकनीकी और आर्थिक समाधानों के समर्थक रहे हैं। वे ट्रंप को युद्ध के भारी भरकम खर्च और तकनीकी नुकसान के बारे में आगाह कर सकते हैं।
8. कतर के अमीर : शेख तमीम बिन हमद
कतर दुनिया का वह इकलौता देश है जो हमास, ईरान और अमेरिका—तीनों से एक साथ बात करता है। ट्रंप के साथ उनकी हालिया बातचीत और ईरान के साथ उनके पुराने ऊर्जा संबंधों के कारण, कतर एक ऐसी 'खिड़की' है जिसे कोई भी पक्ष बंद नहीं करना चाहेगा।
9. ईरान के कठोर प्रहरी : इस्माइल कानी
रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के प्रमुख के रूप में इस्माइल कानी वर्तमान में युद्ध के मैदान के सेनापति हैं। वे युद्ध रोकने वाले नहीं, बल्कि उसे चलाने वाले व्यक्ति हैं। हालांकि, उनकी अहमियत इसलिए है क्योंकि उनके बिना मोजतबा खामेनेई कोई भी समझौता नहीं करेंगे। यदि बैक-चैनल डिप्लोमेसी से कानी को कोई सुरक्षा गारंटी मिलती है, तभी ईरान पीछे हटेगा।
क्या शांति संभव है?
मौजूदा स्थिति 1962 के क्यूबन मिसाइल संकट जैसी है। डोनाल्ड ट्रंप की शांति के जरिए ताकत की नीति और मोजतबा खामेनेई की प्रतिशोध के जरिए वजूद की लड़ाई के बीच ये 10 व्यक्ति ही वे धागे हैं जो दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध में गिरने से बचा सकते हैं। आधिकारिक सूत्रों (जैसे Foreign Policy और Reuters) की मानें तो मध्य-पूर्व में कोई भी युद्ध तब तक नहीं रुकता जब तक कि दोनों पक्षों को एक सम्मानजनक निकास न मिल जाए। ओमान की मध्यस्थता और भारत-कतर का कूटनीतिक दबाव इस निकास का रास्ता बना सकता है।


