क्या ईरान का युद्ध आपकी जेब और भारत की GDP को प्रभावित करेगा?
क्या ईरान-इजराइल युद्ध की वजह से कच्चे तेल की कीमतें 94 डॉलर के पार जा चुकी हैं? क्या पेट्रोल के दाम बढ़ेंगे? एक्सपर्ट्स से जानें भारत पर क्या होगा असर?

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क । मिडल ईस्ट में चल रहे संघर्ष की लपटें अब भारतीय रसोई और अर्थव्यवस्था तक पहुंच गई हैं। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की कीमतें जिस तरह से 'विस्फोट' किया है, उससे भारत की GDP ग्रोथ धीमी हो सकती है और महंगाई में 0.50% तक का इजाफा हो सकता है। जानिए एक दूर देश का संघर्ष आपके पेट्रोल बिल और बजट को कैसे प्रभावित कर सकता है।
ईरान और इजराइल के बीच की दूरी शायद हजारों किलोमीटर है, मगर आर्थिक मोर्चे पर ये दूरी कहीं दूर नहीं लगती। 28 फरवरी को ईरान पर हुई जॉइंट स्ट्राइक ने वैश्विक बाजार में हड़कंप मचा दिया। ब्रेंट क्रूड की कीमत, जो कुछ समय पहले 73 डॉलर पर थी, तेजी से बढ़कर 85 डॉलर और फिर 94 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 'मिसाइल' की तरह उठती हैं, तो इसका सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
महंगाई का नया मीटर: क्या कहता है गणित?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वेस्ट एशिया का ये तनाव वित्त वर्ष 2027 (FY27) में भारत की महंगाई दर के पूरे गणित को बदल सकता है।
HDFC बैंक का अनुमान: अगर कच्चा तेल औसतन 75 डॉलर पर स्थिर रहता है, तो महंगाई में 0.20% की वृद्धि हो सकती है। लेकिन यदि तनाव बढ़ा, तो यह वृद्धि 0.50% से अधिक भी हो सकती है।
केयरएज रेटिंग्स की चेतावनी: चीफ इकोनॉमिस्ट रजनी सिन्हा के मुताबिक, अगर ब्रेंट क्रूड लगातार 80 डॉलर के ऊपर बना रहता है, तो महंगाई दर 4.3% के पिछले अनुमान को पार कर जाएगी।
नया CPI वेटेज: एक महत्वपूर्ण बात ये है कि नई CPI श्रृंखला में पेट्रोल और डीजल का वेटेज 2.3% से बढ़कर 4.8% हो गया है। इसका मतलब है कि अब तेल की कीमतों में छोटी-छोटी हलचल भी महंगाई के आंकड़ों को पहले की तुलना में दोगुना प्रभावित कर सकती है।
क्या आप जानते हैं? भारत जो तेल मंगाता है, उसका लगभग आधा हिस्सा 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) से गुजरता है। अगर युद्ध के चलते ये रास्ता बाधित हुआ, तो सप्लाई चेन पूरी तरह टूट सकती है।
GDP और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) पर 'डबल अटैक'
सिर्फ महंगाई पर ही नहीं, देश की अर्थव्यवस्था यानी GDP पर भी इस युद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस का कहना है कि सप्लाई चेन में रुकावट आने से भारत की ग्रोथ 20-30 बेसिस पॉइंट (bps) तक गिर सकती है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में हर 10% की वृद्धि भारत की रियल GDP ग्रोथ को 0.15% तक कम कर देती है। इसके साथ ही, हमारा करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) भी बढ़ सकता है। नोमुरा के मुताबिक, तेल की कीमतों में 10% की उछाल CAD को GDP के 0.4% तक बढ़ा देती है, जो कि अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है।
सबसे बड़ा सवाल: क्या महंगा होगा पेट्रोल और डीजल?
हर भारतीय के मन में यही सवाल है कि क्या कल सुबह पेट्रोल पंप पर कीमतें बढ़ी हुई मिलेंगी? इस बारे में विशेषज्ञों की राय थोड़ी राहत देने वाली है:
रिटेल कीमतों पर नियंत्रण: IDFC फर्स्ट बैंक की गौरा सेनगुप्ता का मानना है कि सरकार फिलहाल रिटेल कीमतों में बढ़ोतरी नहीं होने देगी ताकि आम जनता को सीधा झटका न लगे।
सरकारी हस्तक्षेप: हालांकि, अगर कच्चा तेल 90-100 डॉलर के पार टिका रहता है, तो ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को घाटा बढ़ जाएगा। ऐसी स्थिति में सरकार को या तो एक्साइज ड्यूटी घटानी होगी या फिर कीमतों में आंशिक वृद्धि की अनुमति देनी होगी।
मार्जिन में कमी: फिलहाल कंपनियों का मुनाफा (प्रोड्यूसर मार्जिन) कम हो सकता है, लेकिन उपभोक्ता कुछ समय के लिए 'बफर' पा सकता है।
मिडल ईस्ट का संकट सिर्फ एक कूटनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक 'स्ट्रेस टेस्ट' है। भारत के लिए यह चुनौती है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को कैसे सुरक्षित रखे और बढ़ते आयात बिल के बीच अपनी विकास दर को किस तरह बनाए रखे।


