दुनियाभर में तेल-गैस के लिए हाहाकार, पर चीन में क्यों नहीं?
विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज में संभावित संकट के बावजूद कई देशों की तुलना में चीन तेल आपूर्ति झटकों का बेहतर सामना कर सकता है। अब भी चीन में तेल संकट नहीं है। उसने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सिर्फ मध्य-पूर्व पर निर्भर नहीं रहने दिया है।

वाईबीएन डेस्क, नई दिल्ली। ईरान के साथ बढ़ते सैन्य तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे ने एक बार फिर दुनिया को याद दिला दिया है कि ऊर्जा आपूर्ति कितनी नाजुक और कितनी राजनीतिक हो सकती है। टैंकरों की आवाजाही घटने लगी है, तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर चुकी हैं और कई देश अचानक इस सवाल से जूझ रहे हैं कि अगर यह रास्ता बंद हो गया तो क्या होगा, लेकिन इस पूरी घबराहट के बीच एक देश ऐसा है जो अपेक्षाकृत शांत दिखता है-और वह है चीन। यह शांति कोई लापरवाही नहीं, बल्कि दो दशकों की सोची-समझी तैयारी का नतीजा है।
क्या है चीन की ऊर्जा रणनीति?
विशेषज्ञों का कहना है कि बीजिंग ने पिछले करीब 20 वर्षों में एक ऐसी बहुस्तरीय ऊर्जा रणनीति तैयार की है, जो उसे इस तरह के संकटों में बाकी देशों से कहीं बेहतर स्थिति में रखती है। इस रणनीति के चार मुख्य स्तंभ हैं-विशाल रणनीतिक तेल भंडार, आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण, दीर्घकालिक द्विपक्षीय ऊर्जा समझौते और वैश्विक बुनियादी ढांचे में भारी निवेश।होर्मुज जलडमरूमध्य से हर रोज करीब 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है, जो पूरी दुनिया की कुल तेल खपत का लगभग 20 फीसदी है। यह संकरा समुद्री रास्ता खाड़ी देशों के तेल को बाकी दुनिया तक पहुंचाने का सबसे अहम जरिया है। ऐसे में यहां किसी भी वजह से रुकावट आए तो असर तुरंत और व्यापक होगा और यही डर अभी बाजारों में दिखाई दे रहा है।
ईरान से तेल का सबसे बड़ा निर्यातक है बीजिंग
चीन खुद इस रास्ते पर बहुत बड़े पैमाने पर निर्भर है। ऊर्जा विश्लेषण फर्म Kpler के 2025 के आंकड़े बताते हैं कि ईरान से दुनियाभर में निर्यात होने वाले तेल का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा अकेले चीन खरीदता है। पिछले साल चीन ने औसतन करीब 13.8 लाख बैरल प्रतिदिन ईरानी तेल आयात किया, जो उसके समुद्री रास्ते से होने वाले कुल तेल आयात का लगभग 13.4 फीसदी था। इन आंकड़ों को देखकर कोई भी सोच सकता है कि होर्मुज में संकट आने पर चीन सबसे ज्यादा परेशानी में होना चाहिए, लेकिन हकीकत इससे अलग है।
रूस से सीधे तेल और गैस की आपूर्ति
चीन की तैयारी का सबसे ठोस सबूत है उसके रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार। पिछले दो दशकों में बीजिंग ने देशभर में विशाल भंडारण सुविधाएं विकसित की हैं, जिनमें करोड़ों बैरल कच्चा तेल जमा किया जा सकता है। अनुमान है कि इन भंडारों में इतना तेल है कि चीन बाहरी आपूर्ति के बिना भी 100 दिनों से अधिक समय तक अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है। यह समय किसी भी संकट में वैकल्पिक इंतजाम करने के लिए काफी होता है, लेकिन चीन ने सिर्फ भंडार बनाने पर भरोसा नहीं किया। उसने अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को इस तरह फैलाया है कि कोई एक देश या एक रास्ता बंद होने से पूरी व्यवस्था न चरमराए। इसमें रूस की भूमिका सबसे अहम है। पाइपलाइन नेटवर्क और दीर्घकालिक समझौतों के जरिए चीन को रूस से सीधे तेल और गैस मिलती है-बिना किसी समुद्री मार्ग से गुजरे। यानी होर्मुज बंद हो तो भी यह आपूर्ति नहीं रुकती। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरानी तेल की आपूर्ति में बाधा आती है तो चीन-रूस ऊर्जा सहयोग और गहरा हो सकता है, क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले से मजबूत रणनीतिक संबंध हैं। इसके अलावा अफ्रीका, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका से भी तेल आयात बढ़ाकर चीन ने जोखिम को कई भौगोलिक दिशाओं में बांट दिया है।
तनाव के बावजूद ईरान के साथ नहीं तोड़े ऊर्जा संबंध
तनाव के बावजूद चीन ने ईरान के साथ अपने ऊर्जा संबंध नहीं तोड़े हैं। दोनों देशों के बीच 25 साल का रणनीतिक सहयोग समझौता मौजूद है। इसके तहत चीन ईरान के बुनियादी ढांचे और ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश करता है और बदले में उसे स्थिर और अपेक्षाकृत सस्ता तेल मिलता रहता है-भू-राजनीतिक उठापटक के दौर में भी। यह समझौता चीन को एक ऐसा ऊर्जा स्रोत सुनिश्चित करता है, जो बाजार की कीमतों से कुछ हद तक अलग और अधिक स्थिर रहता है।
वैकल्पिक रास्ते कर रखे हैं तैयार
बेल्ट एंड रोड पहल चीन की इस पूरी ऊर्जा रणनीति की रीढ़ की तरह काम करती है। एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीका में बंदरगाह, पाइपलाइन और परिवहन गलियारे बनाकर बीजिंग ने न सिर्फ व्यापार के नए रास्ते खोले हैं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति के ऐसे वैकल्पिक मार्ग भी तैयार किए हैं, जो समुद्री रास्तों पर निर्भर नहीं हैं। मध्य एशिया और रूस से आने वाली पाइपलाइनें इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। और इन सबके साथ-साथ चीन ने एक और चतुराई दिखाई है-मध्य-पूर्व के सैन्य संघर्षों से खुद को दूर रखना। बीजिंग हमेशा से कूटनीतिक समाधान और संवाद की बात करता आया है। इससे उसे क्षेत्र के विभिन्न देशों के साथ एक साथ संतुलित संबंध बनाए रखने में मदद मिलती है और राजनीतिक जोखिम भी कम होता है।
चीन के लिए अचानक आई मुसीबत नहीं
कुल मिलाकर होर्मुज का मौजूदा संकट चीन के लिए कोई अचानक आई मुसीबत नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह ठीक वही परिदृश्य है, जिसके लिए बीजिंग पिछले लगभग दो दशकों से खामोशी के साथ तैयारी करता आ रहा था। बड़े तेल भंडार, विविध आपूर्ति स्रोत, मजबूत द्विपक्षीय समझौते और वैश्विक बुनियादी ढांचे में रणनीतिक निवेश-इन सब मिलाकर चीन ने एक ऐसा कवच तैयार किया है, जो उसे उस वक्त भी सुरक्षित रखता है जब दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा मार्ग अस्थिरता के कगार पर हो।


