ट्रंप ने किसको दी चेतावनी, होर्मुज की जंग में साथ दो वरना...
7 देशों से सैन्य मदद की अपील करते हुए क्या बोले डोनाल्ड ट्रंप? क्या अमेरिका के दबाव में झुकेंगे बाकी देश? पढ़ें यह विशेष रिपोर्ट।

Hormuz Strait Crisis: ईरान ने जब दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई लाइन 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को बंद किया, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में हड़कंप मच गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की सैन्य ताकत को नष्ट करने का दावा करते हुए, 7 प्रमुख देशों से सैन्य हस्तक्षेप की अपील की है। उन्होंने NATO को भी स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका का साथ नहीं दिया गया, तो संगठन का भविष्य संदेह में पड़ सकता है।
दुनिया के नक्शे पर एक छोटा सा समुद्री रास्ता, जिसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज कहा जाता है, अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है। ईरान ने जब इस रास्ते पर रोक लगाई, तो पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम आसमान पर पहुंच गए।
ह्वाइट हाउस से आई ताजा जानकारी ने बीजिंग से लेकर ब्रसेल्स तक हलचल मचा दी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि अमेरिका अब अकेला नहीं रहेगा। उनका तर्क सीधा है—जिस रास्ते से चीन जैसे देश अपना 90% तेल मंगाते हैं, उसकी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैनिकों का खून और टैक्सपेयर्स का पैसा क्यों खर्च करना चाहिए?
7 देशों को 'अल्टीमेटम', NATO पर लटकी तलवार
ट्रंप ने बताया है कि वे चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन सहित 7 प्रमुख देशों से संपर्क में हैं। उन्होंने इन देशों से तुरंत अपने युद्धपोत होर्मुज की खाड़ी में भेजने की मांग की, ताकि तेल की सप्लाई बहाल की जा सके।
सबसे चौंकाने वाला बयान NATO को लेकर आया है। ट्रंप ने कहा कि अगर NATO देश इस संकट में अमेरिका की रणनीतियों को अनदेखा करते हैं, तो संगठन का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। उन्होंने साफ कहा कि अब अमेरिका एकतरफा मदद करने के मूड में नहीं है।
"हमने दशकों तक इस रास्ते की सुरक्षा की है, जबकि हमें वहां से सिर्फ 1% तेल मिलता है। अब जब ईरान की सैन्य शक्ति कमजोर पड़ चुकी है, तो बाकी देशों को अपनी जिम्मेदारी उठानी होगी।" — डोनाल्ड ट्रंप
ईरान की सैन्य शक्ति पर ट्रंप का बड़ा दावा
ट्रंप ने अपने सैन्य हमलों में जीत का दावा करते हुए कहा कि अमेरिकी हमले ने ईरान की नेवी और एयरफोर्स को लगभग निष्क्रिय बना दिया है। उनके अनुसार, अमेरिका ने उन ठिकानों को निशाना बनाया है जहां ईरान अपने घातक ड्रोन और मिसाइलें तैयार करता था।
इतना ही नहीं, ट्रंप का कहना है कि ईरान का सबसे बड़ा ऑयल डिपो 'खर्ग द्वीप' अब मलबे में तब्दील हो चुका है। उनका मानना है कि ईरान के पास पलटवार करने के लिए पर्याप्त मिसाइलें और ड्रोन नहीं बचे हैं। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान अब बातचीत के लिए बेचैन है, लेकिन अमेरिका अपनी शर्तों पर ही आगे बढ़ेगा।
ब्रिटेन की 'हिचकिचाहट' और ट्रंप की नाराजगी
खबरों के अनुसार, ट्रंप ने कुछ समय पहले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री से सैन्य मदद मांगी थी। लेकिन उस वक्त ब्रिटेन अपने दो बड़े विमान वाहक जहाजों को भेजने में हिचकिचा रहा था। ट्रंप ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जब अमेरिका ने दुश्मन को लगभग खत्म कर दिया, तब जाकर ब्रिटेन ने मदद का हाथ बढ़ाया।
ट्रंप ने चेतावनी दी कि "अमेरिका याद रखेगा" कि मुश्किल वक्त में किन देशों ने मुंह मोड़ा और कौन उनके साथ खड़ा रहा। उनके इस बयान ने यूरोपीय देशों के बीच बेचैनी बढ़ा दी है।
क्या दुनिया का साथ मिलेगा? जमीनी हकीकत है अलग
जितना ट्रंप 7 देशों से बातचीत का दावा कर रहे हैं, असलियत में परिस्थितियाँ काफी जटिल हैं। ऑस्ट्रेलिया ने ट्रंप के अनुरोध के बावजूद होर्मुज स्ट्रेट में अपना नौसैनिक जहाज भेजने से साफ इनकार कर दिया है।
वहीं, सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे खाड़ी देश इस समय 'डिफेंसिव मोड' में हैं। वे ईरान के साथ सीधे युद्ध में कूदकर अपनी अर्थव्यवस्था को जोखिम में नहीं डालना चाहते। चीन के लिए यह रास्ता जीवन रेखा है, लेकिन वह भी अमेरिकी नेतृत्व वाले किसी भी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने से बच रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप का यह कदम वैश्विक राजनीति में बड़ा जुआ माना जा रहा है। एक तरफ वह ईरान को पूरी तरह अलग-थलग करना चाहते हैं, दूसरी ओर अपने सहयोगियों पर दबाव बना रहे हैं कि वे भी इस युद्ध का खर्च उठाएं। अगर होर्मुज का रास्ता जल्द नहीं खुला, तो वैश्विक मंदी के दरवाजे खुल सकते हैं।
अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप की 'सख्त कूटनीति' NATO और एशियाई महाशक्तियों को झुकाने में सफल होगी, या अमेरिका इस मोर्चे पर अकेला रह जाएगा।


