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तेल की कीमतें 100 डॉलर पार: ये क्या चाह रहे G7 देश

ईरान युद्ध के बीच तेल कीमतें 100 डॉलर पार, जी7 देश वैश्विक बाजार स्थिर करने के लिए आपात तेल भंडार जारी करने पर विचार।

Mishra
तेल की कीमतें 100 डॉलर पार: ये क्या चाह रहे G7 देश
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वाईबीएन डेस्क, नई दिल्ली।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-इज़राइल तथा ईरान के बीच संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार में अचानक उथल-पुथल देखने को मिल रही है। कच्चे तेल की कीमत 2022 के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई है। इस स्थिति ने दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को चिंतित कर दिया है।

इसी पृष्ठभूमि में दुनिया की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह G7 के वित्त मंत्री आपातकालीन तेल भंडार जारी करने पर विचार कर रहे हैं। यह चर्चा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की समन्वित बैठक में होने वाली है। उद्देश्य यह है कि अगर युद्ध के कारण तेल आपूर्ति में बाधा आती है, तो बाजार में अतिरिक्त तेल डालकर कीमतों को स्थिर किया जा सके।

यह कदम इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही संवेदनशील स्थिति में है और पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ती जा रही है।


हुईG7 की आपात बैठक क्यों बुलाई गई

रिपोर्टों के अनुसार G7 देशों के वित्त मंत्री एक आपातकालीन कॉल में वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिति पर चर्चा करेंगे। यह बैठक न्यूयॉर्क समय के अनुसार सुबह 8:30 बजे आयोजित की जानी है।

सूत्रों के मुताबिक, कम से कम तीन G7 देशों ने पहले ही आपातकालीन तेल भंडार जारी करने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। इन भंडारों का उद्देश्य ऐसी ही परिस्थितियों में बाजार को स्थिर करना होता है जब तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने लगें या आपूर्ति बाधित हो जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है और आपूर्ति प्रभावित होती है, तो दुनिया को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए पहले से तैयारी करना आवश्यक माना जा रहा है।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार संयुक्त रूप से लगभग 30 से 40 करोड़ बैरल तेल जारी किया जा सकता है। यह मात्रा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के सदस्य देशों के पास मौजूद लगभग 1.2 अरब बैरल आपातकालीन भंडार का करीब 25 से 35 प्रतिशत होगी। IEA के 32 सदस्य देशों के पास रणनीतिक तेल भंडार मौजूद हैं। यह व्यवस्था खास तौर पर इसलिए बनाई गई थी ताकि वैश्विक संकट की स्थिति में ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर रखा जा सके।

यदि इन भंडारों को बाजार में उतारा जाता है तो इससे तेल की कीमतों में तेजी को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

यूरोप भी कर रहा स्थिति की समीक्षा

यूरोपीय संघ भी इस संकट को लेकर सतर्क हो गया है। यूरोपीय संघ के तेल और गैस आपूर्ति समन्वय समूह ने भी स्थिति की समीक्षा के लिए बैठक बुलाने की घोषणा की है।

यूरोपीय संघ के नियमों के अनुसार सदस्य देशों को कम से कम 90 दिनों की खपत के बराबर तेल का भंडार रखना अनिवार्य होता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी आपूर्ति संकट के दौरान ऊर्जा उपलब्धता बनी रहे।


पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने का असर केवल तेल बाजार पर ही नहीं बल्कि गैस बाजार पर भी पड़ा है।

ब्रिटेन में अगले महीने की गैस कीमत में लगभग 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 163 पेंस प्रति थर्म तक पहुंच गई। वहीं यूरोप के महाद्वीपीय गैस बाजार में भी कीमतों में लगभग 16 प्रतिशत का उछाल आया।

ऊर्जा कीमतों में इस तेज वृद्धि ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संभावित दबाव को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

शेयर बाजारों पर भी पड़ा असर

तेल कीमतों में तेजी का असर वैश्विक शेयर बाजारों पर भी दिखाई दिया। एशिया, ब्रिटेन और यूरोप के कई प्रमुख शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई।

ब्रिटेन का प्रमुख सूचकांक FTSE 100 लगभग 1.9 प्रतिशत गिर गया। जर्मनी का डैक्स लगभग 1 प्रतिशत नीचे चला गया जबकि फ्रांस का CAC 40 सूचकांक 0.7 प्रतिशत गिरा।

यूरोप की बड़ी कंपनियों को ट्रैक करने वाला स्टॉक्स यूरोप 600 इंडेक्स भी लगभग 1.5 प्रतिशत गिर गया और इस वर्ष की अब तक की सारी बढ़त खत्म हो गई।

निवेशकों को आशंका है कि अगर तेल आपूर्ति प्रभावित हुई तो इससे वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

पश्चिम एशिया में ऊर्जा ठिकानों पर हमले

रिपोर्टों के अनुसार तेहरान और उसके आसपास कम से कम पांच ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले हुए हैं। इसके अलावा कुवैत की राष्ट्रीय तेल कंपनी ने भी एहतियात के तौर पर उत्पादन में कटौती की घोषणा की है।

इन घटनाओं ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता और बढ़ा दी है।


पश्चिम एशिया के इस संकट में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है।

वैश्विक तेल और समुद्री गैस परिवहन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।

रिपोर्टों के अनुसार यह मार्ग लगभग एक सप्ताह से प्रभावी रूप से बंद पड़ा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता और बढ़ गई है।

तेल कीमतों में तेज उछाल

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत सोमवार को शुरुआती कारोबार में लगभग 29 प्रतिशत तक उछलकर 119.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।

हालांकि G7 की बैठक की खबर सामने आने के बाद कीमतों में थोड़ी नरमी आई और यह लगभग 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करने लगी।

फिर भी यह स्तर पिछले चार वर्षों में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि तेल कीमतों में वृद्धि वैश्विक सुरक्षा के लिए एक छोटी कीमत है और इसे अल्पकालिक स्थिति बताया।

दूसरी ओर ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर हमले जारी रहे तो तेल कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती हैं।

ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के एक प्रवक्ता ने कहा कि यदि दुनिया 200 डॉलर से अधिक तेल कीमतें सहन कर सकती है तो संघर्ष जारी रह सकता है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की स्थापना 1974 में अरब तेल प्रतिबंध के बाद की गई थी। उस समय पश्चिमी देशों को गंभीर ईंधन संकट का सामना करना पड़ा था।

इस संकट के बाद सदस्य देशों ने रणनीतिक तेल भंडार बनाने का फैसला किया ताकि भविष्य में ऐसे संकटों का सामना किया जा सके।

अब तक IEA पांच बार सामूहिक रूप से इन भंडारों को जारी करने का समन्वय कर चुका है। हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी इन भंडारों का उपयोग किया गया था।

पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को एक बार फिर अस्थिर कर दिया है। तेल की कीमतों का 100 डॉलर से ऊपर पहुंचना इस बात का संकेत है कि आपूर्ति संकट की आशंका गंभीर हो सकती है।

इसी कारण G7 देश आपातकालीन तेल भंडार जारी करने जैसे कदमों पर विचार कर रहे हैं। यदि यह निर्णय लागू होता है तो इसका उद्देश्य बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति देकर कीमतों को नियंत्रित करना होगा।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबा चलता है तो केवल रणनीतिक भंडार भी लंबे समय तक वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे।


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