खाड़ी देशों की पानी पर निर्भरता क्यों बन सकती है कमजोरी
खाड़ी देशों की पानी जरूरतें डिसैलिनेशन प्लांट्स पर निर्भर हैं, जिन पर हमले पूरे क्षेत्र में मानवीय और रणनीतिक संकट पैदा कर सकते हैं

वाईबीएन डेस्क, नई दिल्ली।
मध्य-पूर्व के खाड़ी देशों को अक्सर तेल और गैस की ताकत से पहचाना जाता है, लेकिन इस क्षेत्र की एक ऐसी कमजोर कड़ी भी है जो किसी बड़े संघर्ष में गंभीर संकट पैदा कर सकती है—पानी।
दरअसल सऊदी अरब, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान जैसे देशों में पीने का पानी बड़े पैमाने पर डिसैलिनेशन प्लांट्स से आता है। ये प्लांट समुद्र के पानी को साफ कर पीने योग्य बनाते हैं। हाल के दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव के दौरान जब कुछ डिसैलिनेशन प्लांट्स पर हमले की खबरें सामने आईं, तो विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यह पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है।
यह सिर्फ एक तकनीकी या औद्योगिक ढांचा नहीं है, बल्कि खाड़ी देशों के अस्तित्व से जुड़ा बुनियादी संसाधन है।
डिसैलिनेशन प्लांट क्यों इतने जरूरी
खाड़ी क्षेत्र दुनिया के सबसे शुष्क इलाकों में गिना जाता है। यहां बारिश बहुत कम होती है और ज्यादातर देशों के पास बड़ी नदियां भी नहीं हैं। इतिहास में इस क्षेत्र के लोग सीमित भूजल संसाधनों पर निर्भर थे। लेकिन 1950 के दशक में तेल उद्योग के तेजी से बढ़ने और शहरों के विस्तार के साथ पानी की मांग बहुत बढ़ गई। धीरे-धीरे भूजल स्रोत भी कमज़ोर पड़ने लगे।
यहीं से समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाली तकनीक यानी डिसैलिनेशन का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर शुरू हुआ।
आज स्थिति यह है कि कई देशों की जल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इन्हीं प्लांट्स से आता है। सऊदी अरब को लगभग 70% पीने का पानी यहीं से मिलता है। इसके अलावा ओमान लगभग 86%, संयुक्त अरब अमीरात लगभग 42% और कुवैत अपने पेयजल के लिए 90% तक इस पर निर्भर है। यहां तक कि इजराइल जैसे देश, जिनके पास जॉर्डन नदी का स्रोत है, भी अपनी पीने के पानी की लगभग आधी जरूरत पांच बड़े समुद्री डिसैलिनेशन प्लांट्स से पूरी करते हैं।
दुनिया के पानी उत्पादन में मध्य-पूर्व की बड़ी भूमिका
आंकड़ों के अनुसार, पूरी दुनिया में बनने वाले डिसैलिनेटेड पानी का लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन मध्य-पूर्व में होता है। इस क्षेत्र में प्रतिदिन लगभग 2.89 करोड़ क्यूबिक मीटर समुद्री पानी को पीने योग्य बनाया जाता है।
तकनीकी विशेषज्ञों के मुताबिक खाड़ी देशों के आधुनिक शहर—दुबई, रियाद, कुवैत सिटी या दोहा—इन प्लांट्स के बिना सामान्य रूप से काम ही नहीं कर सकते। अगर इनमें से कुछ बड़े प्लांट बंद हो जाएं तो कुछ ही दिनों में पानी की भारी कमी हो सकती है।
हाल के तनाव के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास क़ेश्म द्वीप पर एक डिसैलिनेशन प्लांट पर हमले की खबर आई थी। ईरान ने इसके लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया, जबकि अमेरिका ने आरोपों से इनकार किया।
इसके अगले ही दिन बहरीन ने भी अपने एक डिसैलिनेशन प्लांट पर हमले की सूचना दी और इसके लिए ईरान को दोषी बताया। इन घटनाओं ने इस आशंका को जन्म दिया कि अगर दोनों पक्ष एक-दूसरे की जल संरचनाओं को निशाना बनाना शुरू कर दें तो पूरा क्षेत्र गंभीर मानवीय संकट में फंस सकता है।
हमला क्यों खतरनाक
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल रिफाइनरी या गैस संयंत्रों की तुलना में डिसैलिनेशन प्लांट ज्यादा संवेदनशील होते हैं। इनकी संख्या सीमित होती है और अक्सर एक ही बड़े तटीय संयंत्र पर पूरा शहर निर्भर करता है।
अगर किसी बड़े प्लांट को गंभीर नुकसान पहुंचता है तो कुछ ही दिनों में पीने के पानी की कमी हो सकती है। सरकारों को शहरों में पानी की राशनिंग करनी पड़ सकती है। नागरिकों में घबराहट और सामाजिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। इसी वजह से विशेषज्ञ इसे खाड़ी देशों की “स्ट्रक्चरल कमजोरी” मानते हैं।
डिसैलिनेशन प्लांट सिर्फ पानी साफ नहीं करते, बल्कि इसमें कई रसायनों का इस्तेमाल होता है। अगर किसी हमले में प्लांट क्षतिग्रस्त हो जाए तो समुद्र या आसपास के पर्यावरण में सोडियम हाइपोक्लोराइट, फेरिक क्लोराइड, सल्फ्यूरिक एसिड जैसे कई रसायन फैल सकते हैं। ये रसायन समुद्री जीवन और तटीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
ईरान भी पानी संकट से जूझ रहा
हालांकि खाड़ी देशों की तुलना में ईरान डिसैलिनेशन पर कम निर्भर है, लेकिन वहां भी पानी का संकट गंभीर है। पिछले कई वर्षों से देश लगातार सूखे का सामना कर रहा है। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन, भूजल का अत्यधिक दोहन और नदियों के घटते प्रवाह जैसे कारण बताए जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी संघर्ष में ईरान की जल संरचनाओं—जैसे जलाशय, पंपिंग स्टेशन या जल शोधन संयंत्र—को नुकसान पहुंचता है तो वहां की स्थिति और खराब हो सकती है।
हालिया घटनाओं के बाद रविवार के बाद से किसी और डिसैलिनेशन प्लांट पर हमला नहीं हुआ। विशेषज्ञ इसे “रणनीतिक संयम” मानते हैं। क्योंकि पानी की संरचनाओं पर हमला सीधे नागरिक आबादी को प्रभावित करता है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है और संघर्ष तेजी से व्यापक हो सकता है।
भविष्य की चिंता
फिर भी यह खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ईरान की संसद के स्पीकर ने हाल ही में कहा कि अगर दुश्मन बुनियादी ढांचे पर हमला करता है तो ईरान भी “जैसे को तैसा” जवाब देगा।
ऐसे बयान इस बात का संकेत देते हैं कि अगर संघर्ष बढ़ता है तो पानी की संरचनाएं भी संभावित निशाने बन सकती हैं। खाड़ी क्षेत्र के लिए तेल भले ही आर्थिक ताकत का प्रतीक हो, लेकिन पानी उसका असली जीवन स्रोत है। डिसैलिनेशन प्लांट्स ने इन रेगिस्तानी देशों को आधुनिक शहरों में बदलने में मदद की है। लेकिन यही संरचनाएं किसी बड़े संघर्ष में उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती हैं।


