गलत तरीके से नहाना पड़ सकता है भारी! आयुर्वेद से सीखें स्नान की सही विधि
आयुर्वेद में स्नान केवल शरीर की बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शुद्धि का साधन माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार, स्नान से जठराग्नि प्रदीप्त होती है, रक्त शुद्ध होता है और इंद्रियों को ताजगी मिलती है।

नई दिल्ली। आयुर्वेद में स्नान केवल शरीर की बाहरी सफाई नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शुद्धि का साधन माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार, स्नान से जठराग्नि प्रदीप्त होती है, रक्त शुद्ध होता है और इंद्रियों को ताजगी मिलती है। भागदौड़ भरी जिंदगी में हर काम तेजी से किया जा रहा है, क्योंकि खुद के लिए कुछ भी करने का समय ही नहीं है।
अभ्यंग:
सूर्योदय से पूर्व का स्नान सबसे लाभकारी है। नहाने से 15-20 मिनट पहले तिल या सरसों के तेल से मालिश करें। सिर के लिए हमेशा सामान्य या गुनगुना पानी ही इस्तेमाल करें; शरीर के लिए हल्का गर्म पानी श्रेष्ठ है। पानी सबसे पहले सिर पर डालें, फिर पैरों पर। इससे शरीर की गर्मी बाहर निकल जाती है।
जीवनशैली इतनी जटिल हो गई है कि खाना भी आराम से खाने का समय नहीं मिलता। खाने के साथ-साथ ठीक से नहाने तक का समय नहीं मिलता है। आमतौर पर धारणा है कि नहाना सिर्फ एक नित्य कर्म है, जिसका उद्देश्य केवल शरीर की बाहरी स्वच्छता तक सीमित है, लेकिन ऐसा नहीं है। आयुर्वेद में स्नान को 'संस्कार' और 'चिकित्सा' माना गया है, जो तन के साथ-साथ मन की भी शुद्धि करता है। स्नान संस्कार शरीर की गंदगी को दूर रखने के साथ मन को ऊर्जा से भरने के लिए भी लाभकारी है। इसके अलावा स्नान करने से पाचन शक्ति मजबूत होती है, सुस्ती दूर होती है, मन प्रसन्न रहता है, नकारात्मक शक्ति कम होती है, रक्त का संचार अच्छे से होता है, और थकान भी कम महसूस होती है।
रोजाना स्नान करने से मेटाबॉलिज्म में सुधार होता है और शरीर की 'अग्नि' संतुलित होती है। इसका कनेक्शन शरीर के तापमान से भी रहता है। शरीर का अपने नियमित तापमान में रहना बहुत जरूरी है और शरीर के तापमान को स्नान नियंत्रित करता है। आयुर्वेद कहता है कि जब शरीर पर पानी पड़ता है तो पूरे शरीर में रक्त का संचार तेजी से होता है और पाचन अग्नि भी तेजी से काम करती है।
स्नान करने से तनाव और 'कोर्टिसोल' का स्तर भी कम होता है। शोध में भी पाया गया है कि स्नान करने से शरीर में 'एंडोर्फिन' का स्तर बढ़ता है। ये हार्मोन मन को प्रसन्न करने का काम करते हैं और तनाव को कम करते हैं। इसके अलावा, स्नान अच्छी नींद लाने में भी सहायक है। अगर नींद आने में परेशानी होती है, तो गुनगुने पानी से स्नान करने से आराम मिलता है और नर्वस सिस्टम शांत होता है। अगर स्नान करना संभव नहीं है, तो गुनगुने पानी में कुछ समय पैर को डुबोकर रख सकते हैं।
अब सवाल है कि स्नान करने का सही तरीका क्या है। आयुर्वेद में स्नान करने के तीन नियम बताए गए हैं। पहला अभ्यंग करना। नहाने से 15 मिनट पहले किसी भी तेल से पूरे शरीर की मालिश करें, जैसे नवजात शिशु की होती है। दूसरा, अभ्यंग के बाद उबटन का प्रयोग करें। उबटन, केमिकल वाले साबुन से कई गुना प्रभावी और असरदार होता है। ये त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाकर नई कोशिकाओं को बनाने में मदद करता है। तीसरा, मंत्रोच्चार करना। स्नान के समय मंत्रोच्चार करना मन और मस्तिष्क दोनों के लिए लाभकारी होता है। ये सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करता है।


