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संजू सैमसन: इंतजार, इम्तिहान और इंकलाब की कहानी

कैसे संजू सैमसन ने संघर्ष, ड्रॉप और आलोचना के बाद 97 रन की पारी से खुद को गेम चेंजर साबित किया

Mishra
संजू सैमसन: इंतजार, इम्तिहान और इंकलाब की कहानी
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वाईबीएन डेस्क, नई दिल्ली।

भारतीय क्रिकेट में पिछले एक दशक से एक नारा बार-बार सोशल मीडिया पर ट्रेंड करता रहा—‘जस्टिस फॉर संजू सैमसन’। हर बार जब टीम चयन में उनका नाम छूटता, यह आवाज़ फिर उठती। लेकिन कोलकाता के ईडन गार्डन्स में खेले गए टी20 वर्ल्ड कप के अहम मुकाबले ने इस कहानी की दिशा बदल दी। वेस्टइंडीज़ के खिलाफ 50 गेंदों में 97 रनों की विस्फोटक, मगर संयमित पारी ने संजू सैमसन को सिर्फ मैच विनर नहीं, बल्कि ‘गेम चेंजर’ बना दिया। यह पारी सिर्फ स्कोरबोर्ड पर दर्ज नहीं हुई, बल्कि एक लंबे संघर्ष का जवाब बन गई।

प्रतिभा पर कभी नहीं था शक

संजू सैमसन को लंबे समय से भारतीय क्रिकेट का सबसे ‘गिफ्टेड’ बल्लेबाज़ माना जाता रहा है। उनकी टाइमिंग, शॉट चयन और सहज छक्के लगाने की क्षमता की तुलना अक्सर रोहित शर्मा से की जाती रही।

17 साल की उम्र में फर्स्ट क्लास क्रिकेट में डेब्यू करने वाले संजू ने दूसरे ही सीजन में दो शतक और एक अर्धशतक जड़कर संकेत दे दिया था कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं। आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स ने उन पर भरोसा जताया। उस समय टीम के कोच राहुल द्रविड़ ने कहा था कि संजू भविष्य में भारत के लिए अहम खिलाड़ी बनेंगे। लेकिन प्रतिभा के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उनका सफर सीधा नहीं रहा।

टीम में जगह, फिर बाहर का रास्ता

2015 में जिम्बाब्वे दौरे पर भारत के लिए टी20 डेब्यू का मौका मिला, लेकिन सिर्फ 19 रन बनाकर उन्हें टीम से बाहर होना पड़ा। इसके बाद चार साल का लंबा इंतज़ार।

आईपीएल और घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बनाने के बावजूद संजू टीम इंडिया में अपनी जगह पक्की नहीं कर पाए। 2024 के टी20 वर्ल्ड कप के लिए टीम में चुने तो गए, लेकिन अधिकतर समय बेंच पर ही बैठे रहे।

दिलचस्प बात यह है कि जब उन्हें आखिरकार लगातार मौके मिले, तो उन्होंने पांच टी20 इंटरनेशनल मैचों में तीन शतक जड़ दिए। इसके बावजूद टीम मैनेजमेंट के प्रयोगों का शिकार होते रहे—कभी ओपनिंग से मिडिल ऑर्डर में भेजे गए, कभी संयोजन के नाम पर बाहर कर दिए गए।


शुभमन गिल के लिए स्लॉट खाली करना हो या ईशान किशन की वापसी—संजू अक्सर पहले विकल्प के तौर पर हटाए गए।

करियर की परिभाषा बदलने वाली पारी

कोलकाता के ईडन गार्डन्स में वेस्टइंडीज़ के खिलाफ मुकाबला ‘करो या मरो’ जैसा था। शुरुआती विकेट जल्दी गिर गए थे। ऐसे समय में संजू सैमसन ने आक्रामकता और संयम का संतुलन दिखाया।

50 गेंदों पर 97 रन—लेकिन यह सिर्फ तेज़ पारी नहीं थी। यह परिपक्वता की पारी थी। जहां पहले वे बड़े शॉट के चक्कर में विकेट गंवा देते थे, इस बार उन्होंने ज़मीन पर शॉट खेले, गैप ढूंढे और साझेदारी बनाई।

मैच के बाद कप्तान सूर्यकुमार यादव ने कहा कि “अच्छे लोगों के साथ अच्छा होता है।” यह बयान उस लंबी बहस का अंत जैसा था, जिसमें सालों से सवाल उठते रहे थे—संजू को मौका क्यों नहीं?

खुद पर शक, फिर विश्वास की वापसी

संजू सैमसन ने खुद स्वीकार किया है कि टीम से अंदर-बाहर होने के दौर ने उन्हें मानसिक रूप से झकझोरा।

उन्होंने कहा—“मैं हमेशा खुद पर डाउट करता रहा। क्या मैं कर सकता हूं? क्या मैं सही हूं? लेकिन विश्वास कभी खत्म नहीं हुआ।”

डगआउट में बैठकर उन्होंने विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे खिलाड़ियों को करीब से देखा। सीखा कि बड़े मंच पर दबाव को कैसे संभाला जाता है।

इस पारी में वही सीख झलक रही थी—घबराहट नहीं, गुस्सा नहीं, सिर्फ प्रक्रिया पर ध्यान।

रिकॉर्ड और नई पहचान


टी20 वर्ल्ड कप में लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत के लिए यह अब तक की सबसे बड़ी पारी है। इससे पहले विराट कोहली ने 82* रन की पारियां खेली थीं, जो रिकॉर्ड थीं।

संजू की 97 रनों की पारी ने न सिर्फ रिकॉर्ड बदला, बल्कि उनकी छवि भी बदल दी। अब वे ‘अनलकी टैलेंट’ नहीं, बल्कि ‘बिग मैच प्लेयर’ बन चुके हैं।

सोशल मीडिया पर भी माहौल बदला। ‘जस्टिस फॉर संजू सैमसन’ की जगह ‘फाइनली जस्टिस हैपन्स’ ट्रेंड करने लगा।

खेल में बदलाव

पहले संजू की आलोचना इस बात को लेकर होती थी कि वे अच्छी शुरुआत के बाद गैर-जिम्मेदाराना शॉट खेल देते हैं। लेकिन इस पारी में उन्होंने खेल की गति को परिस्थिति के अनुसार ढाला।

पूर्व क्रिकेटरों ने भी माना कि उन्होंने हवा में शॉट खेलने के बजाय ज़मीन पर भरोसा किया। यही परिपक्वता उन्हें अलग बनाती है।

संजू ने खुद कहा—“मैंने उस वक्त सिर्फ अगली गेंद के बारे में सोचा। सवालों के बीच खुद पर विश्वास किया और गेंद को उसी हिसाब से खेला जैसी वो थी।”

आगे की राह

क्या यह पारी उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बनेगी? संकेत तो यही हैं। भारतीय टीम में प्रतिस्पर्धा कड़ी है, लेकिन अब संजू सैमसन सिर्फ विकल्प नहीं, बल्कि भरोसे का नाम बन चुके हैं।

अगर वे इसी संयम और निरंतरता के साथ खेलते रहे, तो ‘जस्टिस’ की मांग करने वाले फैन्स को अब शायद आवाज़ उठाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।


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