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कैसे मार्केट रिसर्च से जन्मा क्रिकेट का सबसे रोमांचक फॉर्मेट T20?

T20 क्रिकेट की शुरुआत कैसे हुई, किस मार्केट रिसर्च ने फॉर्मेट को जन्म दिया? जानिए टी20 क्रिकेट का दिलचस्प इतिहास, पहला मैच, 2007 वर्ल्ड कप और आईपीएल तक का सफर।

कैसे मार्केट रिसर्च से जन्मा क्रिकेट का सबसे रोमांचक फॉर्मेट T20?
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नई दिल्ली, आईएएनएस। भले ही भारत के विश्व कप विजेता बनने के साथ टी20 वर्ल्ड कप 2026 खत्म हो गया है, लेकिन 28 मार्च से इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के साथ क्रिकेट का यह फॉर्मेट एक बार फिर से फैंस को लुभाने के लिए तैयार है। टी20 क्रिकेट को इतना अधिक लोकप्रिय बनने में करीब दो दशक लगे हैं। आइए, इसके पीछे की दिलचस्प कहानी के बारे में जानते हैं।

इस उद्देश्य से की गई T20 की शुरूआत

टी20 क्रिकेट की शुरुआत खेल को तेज, रोमांचक और दर्शकों के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से हुई थी। पारंपरिक टेस्ट और वनडे की लंबी अवधि के मुकाबलों की तुलना में यह छोटा प्रारूप तेजी से लोकप्रिय हुआ, जिसमें आक्रामक बल्लेबाजी, तेज गेंदबाजी और फुर्तीली फील्डिंग का अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है।

स्टुअर्ट रॉबर्टसन को जाता है शुरूआत का श्रेय

टी20 फॉर्मेट की शुरुआत का श्रेय इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) के मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव स्टुअर्ट रॉबर्टसन को जाता है, जिनकी सोच ने 21वीं सदी में वर्ल्ड क्रिकेट को एक नई पहचान दिलाई। 21वीं सदी की शुरुआत तक काउंटी मुकाबलों में दर्शकों की मौजूदगी में करीब 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। अधिकारी परेशान थे कि इस खेल के पारंपिक दर्शक आखिर क्यों क्रिकेट के प्रति उतना आकर्षित नहीं हो रहे हैं। चिंता यह भी थी कि क्रिकेट के नए फैंस कहां से आएंगे?

ढाई लाख पाउंड के खर्च से हुआ था सर्वे

स्टुअर्ट रॉबर्टसन को एक मार्केट रिसर्च सर्वे का जिम्मा सौंपा गया, जिसमें कथित तौर पर ढाई लाख पाउंड का खर्चा आया, हालांकि इतने भारी खर्चे का फायदा भी क्रिकेट जगत को मिला। इस सर्वे ने क्रिकेट की इमेज से जुड़ी समस्या की गहराई को सभी के सामने ला दिया। सर्वे से पता चला कि ज्यादातर क्रिकेट मैच उस समय खेल जा रहे हैं, जब लोग दूसरे कामों में व्यस्त होते थे। फैंस के पास मैच का नतीजा जानने के लिए ज्यादा वक्त नहीं था। उस दौर में क्रिकेट का सबसे छोटा फॉर्मेट भी पूरा दिन ले लेता था।

वनडे में बीच के ओवर हो जाते थे नीरस

वनडे मुकाबलों में शुरुआती 15 ओवरों के बाद जब फील्डिंग पर लगी पाबंदियां हट जाती थीं, तो उसके बाद से 45वें ओवरों के बीच खिलाड़ी सिंगल-डबल लेकर स्कोरबोर्ड को आगे बढ़ाते थे। यानी ये बीच के ओवर उनके लिए काफी नीरस होते थे। ऐसे में रॉबर्टसन ने सुझाव दिया कि बीच के उन ओवर्स को ही हटा दिया जाए, तो खेल मजेदार बन सकता है। इससे मैच 7-8 घंटे के बजाय करीब 3 घंटों में ही खत्म हो जाएगा। यह शाम में खेला जा सकता था, जब तक लोग अपने काम निबटा लेते थे और बच्चे अपना होमवर्क खत्म कर चुके होते थे।

2003 में ऐसे हुई थी T20 की शुरूआत

स्टुअर्ट रॉबर्टसन ने इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) के साथ मिलकर काम किया और आखिरकार एक 20-ओवरों के टूर्नामेंट के लिए काउंटी चेयरमैन के सामने वोटिंग के लिए रखा गया। यह टूर्नामेंट बेंसन एंड हेजेस कप की जगह लेने वाला था। इसे अपनाने के पक्ष में 11-7 की वोटिंग हुई। 13 जून 2003 को ईसीबी ने काउंटी क्रिकेट में इस फॉर्मेट की शुरुआत की, जिसे काफी पसंद किया गया। पहला घरेलू मैच हैंपशायर हॉक्स और ससेक्स शार्क के बीच खेला गया, जिसे हॉक्स ने 5 रन से अपने नाम किया था।

टी20 को इन दिग्गज खिलाड़ियों बनाया लोकप्रिय

टी20 क्रिकेट के शुरुआती दौर में कई दिग्गज खिलाड़ियों ने इस प्रारूप को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। एंड्रयू साइमंड्स, क्रिस गेल, ब्रैंडन मैक्कुलम, शाहिद अफरीदी और एबी डिविलियर्स जैसे बल्लेबाज अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी के लिए मशहूर रहे। वहीं, लसिथ मलिंगा और डेल स्टेन जैसे गेंदबाजों ने भी टी20 में अपनी खास पहचान बनाई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहला टी20 मैच ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच 17 फरवरी 2005 को खेल गया था।

भारत ने 2006 में खेला पहला T20 मैच

भारत ने 1 दिसंबर 2006 को अपना पहला टी20 मैच साउथ अफ्रीका के खिलाफ खेला था, जिसे 6 विकेट से जीता। पहला टी20 वर्ल्ड कप साल 2007 में आयोजित किया गया, जिसमें भारत चैंपियन बना। भारत में आईपीएल की शुरुआत साल 2008 में हुई, जिससे पहले साल 2007 में इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) ने लोकप्रियता हासिल कर ली थी। इस लीग का उद्देश्यर गली क्रिकेट के स्तर से ऊपर उठकर पेशेवर खिलाड़ियों को मंच देना था। टी20 प्रारूप ने न सिर्फ इस खेल को लोकप्रिय बनाया, बल्कि दर्शकों की घटती लोकप्रियता के बीच इसे नया जीवन भी दिया। यही वजह है कि आज के दौर में यह फॉर्मेट अपनी चमक बिखेर रहा है।


Dhiraj Dhillon

Dhiraj Dhillon

धीरज ढिल्लों दो दशकों से अधिक समय से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने अपने करियर के दौरान दैनिक हिंदुस्तान और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में नोएडा और गाजियाबाद क्षेत्र में गहन रिपोर्टिंग की है। प्रिंट मीडिया के साथ-साथ, उन्होंने डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी काम किया है। उनकी लेखनी में निष्पक्षता, तथ्यपरकता और गहरी विश्लेषण क्षमता स्पष्ट रूप से झलकती है। समसामयिक विषयों के साथ-साथ स्वास्थ्य, जीवनशैली, विकास संबंधी मुद्दों और राजनीति में उनकी गहरी रुचि रही है। उन्होंने पांच वर्षों तक Centre for Advocacy & Research (CFAR) के साथ मिलकर सार्वजनिक स्वास्थ्य संचार कार्य किया है।

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