असम में पूरी ताकत झोंकने को तैयार झामुमो, पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर अभी भी असमंजस
असम में विस्तार की तैयारी, बंगाल पर रणनीतिक चुप्पी; गठबंधन और वोट बैंक की राजनीति पर उठे नए सवाल

रांची वाईबीएन डेस्क : पूर्वोत्तर के अहम राज्य असम में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। 126 सीटों वाली असम विधानसभा के लिए पार्टी ने न सिर्फ अपने 20 स्टार प्रचारकों की सूची जारी कर दी है, बल्कि संगठन स्तर पर भी व्यापक रणनीति तैयार की जा रही है।
मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन खुद इस अभियान की कमान संभाले हुए हैं। उनके लगातार असम दौरे यह संकेत दे रहे हैं कि झामुमो इस चुनाव को सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि विस्तार के अवसर के रूप में देख रहा है।
इसके अलावा, मंत्री चमरा लिंडा के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन किया गया है, जिसमें सांसद विजय हांसदा और विधायक एमटी राजा शामिल हैं। इन नेताओं को असम में संगठन को मजबूत करने और जनाधार बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
पश्चिम बंगाल को लेकर झामुमो की चुप्पी
जहां एक ओर झामुमो असम में पूरी ताकत से उतरने की तैयारी में है, वहीं पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल को लेकर पार्टी का रुख अब तक स्पष्ट नहीं है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि झामुमो 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सीधे तौर पर हिस्सा नहीं ले सकता। हालांकि, पार्टी नेतृत्व इस पर खुलकर कुछ भी कहने से बच रहा है।
पार्टी के भीतर यह रणनीति मानी जा रही है कि बंगाल में चुनाव लड़ने से विपक्षी वोटों का बंटवारा हो सकता है, जिससे भारतीय जनता पार्टी को फायदा मिल सकता है। ऐसे में झामुमो फिलहाल स्थिति का आकलन कर रहा है और सही समय का इंतजार कर रहा है।
गठबंधन की राजनीति और बढ़ता दबाव
झामुमो के असम चुनाव लड़ने के फैसले ने सहयोगी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है। झारखंड में दोनों दल मिलकर सरकार चला रहे हैं, लेकिन असम में अलग राह अपनाने से गठबंधन की राजनीति पर असर पड़ सकता है।
कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने इस मुद्दे पर सावधानी भरा बयान देते हुए कहा कि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्ष वोटरों को एकजुट रखने की कोशिश जारी है और अंततः जनता ही तय करेगी कि उसे किसके साथ जाना है।
वहीं, झामुमो के केंद्रीय महासचिव मिथिलेश ठाकुर ने संकेत दिया कि अगर असम में सम्मानजनक सीटों का बंटवारा होता है, तो कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना भी बनी हुई है।
विपक्ष के हमले और ट्राइबल वोट पर फोकस
झामुमो की रणनीति पर विपक्ष भी हमलावर है। बीजेपी की विधायक नीरा यादव ने इसे अवसरवादी राजनीति करार देते हुए कहा कि यह गठबंधन सिर्फ सत्ता के लिए बना है, जनता के हित से इसका कोई लेना-देना नहीं है।
वहीं, सीपीआई (माले) के विधायक अरूप चटर्जी ने इसे पुरानी राजनीतिक गलतियों का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि झामुमो को इंडिया ब्लॉक के साथ समन्वय बनाकर चलना चाहिए, नहीं तो चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इधर, झामुमो ने असम की 19 अनुसूचित जनजाति सीटों पर खास नजर टिकाई है। पार्टी का मानना है कि टी-ट्राइब और अन्य आदिवासी समुदायों के बीच उसकी पकड़ मजबूत है और इसका फायदा चुनाव में मिल सकता है।
राजनीतिक संदेश और भविष्य की दिशा
झामुमो की मौजूदा रणनीति को राजनीतिक विश्लेषक दो नजरियों से देख रहे हैं। पहला, पार्टी असम में अपनी ताकत को परखना चाहती है और नए क्षेत्रों में विस्तार की कोशिश कर रही है। दूसरा, यह कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है, ताकि भविष्य में गठबंधन की शर्तें उसके पक्ष में तय हों।
असम में बढ़ती सक्रियता और बंगाल में सतर्क रुख से यह साफ है कि झामुमो अब क्षेत्रीय पार्टी से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की दिशा में काम कर रहा है। आने वाले दिनों में पार्टी का अगला कदम न सिर्फ असम, बल्कि पूर्वी भारत की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।


