सिस्टम की 'गंदगी' से उत्तराखंड में गंगा हुई और मैली, कैग रिपोर्ट में 'नमामि गंगे' प्रोजक्ट की नाकामी गिनाईं
केंद्र ने 2018 से 2023 के बीच राज्य में इस प्रोजेक्ट को असरदार तरीके से लागू करने के लिए 1,000 करोड़ रुपये दिए थे।

नई दिल्ली, वाईबीएन डेस्क। राजनीति में अपनी राजनीति चमकाने के लिए दावे बड़े-बड़े किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर नहीं उतारे जाते हैं। जिससेसुधारों की गाड़ी पटरी से उतर जाती है। ऐसी ही नाकामी उत्तराखंड में नमामी गंगे कार्यक्रम को लेकर सामनेआई है। कम्पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (कैग) की एक रिपोर्ट में उत्तराखंड में केंद्र के 'नमामि गंगे' कार्यक्रम के मनचाहे नतीजे न दे पाने के लिए, इसे लागू करने वाली एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा नदी की सफाई के लिए एक दशक से भी पहले शुरू किए गए इस खास कार्यक्रम के तहत, केंद्र ने 2018 से 2023 के बीच राज्य में इस प्रोजेक्ट को असरदार तरीके से लागू करने के लिए 1,000 करोड़ रुपये दिए थे।
प्रोजेक्ट में कई गड़बड़ियों का ज़िक्र
हालांकि, राज्य के चल रहे बजट सत्र के दौरान पेश की गई इस रिपोर्ट में प्रोजेक्ट में कई गड़बड़ियों का ज़िक्र किया गया है। इनमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के खराब डिज़ाइन, इंफ्रास्ट्रक्चर का ठीक से रखरखाव न होना, गंगा में गिरने वाले नालों को रोकने में नाकामी, और नदियों व छोटी धाराओं के पास कचरा फेंकना शामिल है। CAG ने पाया कि 'गंगा के लिए वानिकी हस्तक्षेप' (FIG) की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) में 885.91 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था और 54,855.43 हेक्टेयर में पेड़ लगाने का लक्ष्य तय किया गया था।
असल में सिर्फ़ 144.27 करोड़ रुपये ही इस्तेमाल हुए
लेकिन, इसके उलट, असल में सिर्फ़ 144.27 करोड़ रुपये ही इस्तेमाल हुए जो कि तय बजट का सिर्फ़ 16 प्रतिशत था। नतीजतन, काम की रफ़्तार धीमी रही, और यह योजना गंगा को फिर से नया जीवन देने से जुड़े खास लक्ष्यों को पाने में नाकाम रही। कैग की रिपोर्ट ने सिस्टम की नाकामी को उजागर कर दिया है। इसकी जिम्मेदारी किसी की है और क्या उन पर कारवाई होगी, यह देखना बाकी है। इस प्रोजक्ट की हालत तबहै, जब हरिद्वार में कुंभ की तैयारियां चल रही हैं।


